अन्नाद्रमुक ने श्रीलंका के खिलाफ यूएनएचआरसी प्रस्ताव का समर्थन करने की मांग की

ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) ने मंगलवार को श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ युद्ध अपराध से संबंधित कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के प्रस्ताव का समर्थन करने की मांग की और कहा कि द्वीपीय राष्ट्र में शांति बहाल करना भारत का नैतिक कर्तव्य है। अन्नाद्रमुक के एम थंबीदुरई ने शून्यकाल में इस मामले को उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वह वादा भी याद दिलाया जिसमें उन्होंने श्रीलंकाई तमिलों के हितों की रक्षा करने की बात कही थी। उन्होंने कहा, ‘‘हम भारत सरकार से आग्रह करते है कि वह भारतीय प्रतिनिधिमंडल को यूएनएचआरसी के उस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान का निर्देश दे जिसमें श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिलों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जांच की बात की गई है।’’

उन्होंने कहा कि प्रस्ताव का समर्थन किए बगैर श्रीलंकाई तमिलों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं की जा सकेगी। उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री ने जब तमिलनाडु का दौरा किया था तब उन्होंने आश्वासन दिया था कि वह श्रीलंकाई तमिलों के हितों की रक्षा करेंगे। इसलिए मैं भारत सरकार से आग्रह करता हूं कि प्रधानमंत्री ने जो प्रतिबद्धता जताई है उसे ध्यान में रखते हुए श्रीलंकाई तमिलों के हितों की रक्षा की जाए।’’ थंबीदुरई ने कहा कि अन्नाद्रमुक ने हमेशा से तमिलों के हितों की आवाज उठाई है।

उन्होंने कहा कि जब भारत फिलिस्तीन जैसे देशों में मानवाधिकार के मामलों का समर्थन कर सकता है तो श्रीलंका में रहने वाले तमिल समुदाय के हितों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए मैं भारत सरकार से आग्रह करता हूं कि वह श्रीलंकाई तमिलों का पक्ष ले।’’ यूएनएचआरसी के प्रस्ताव में जाफना प्रायद्वीप में लिट्टे के खिलाफ कार्रवाई के पीडि़तों को न्याय न मिलने और उनका पुनर्वास न कर पाने में सरकार की विफलता का उल्लेख होगा। श्रीलंका ने लिट्टे के खिलाफ 2009 में कार्रवाई की थी जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष तमिल नागरिक भी मारे गए थे। इस प्रस्ताव में श्रीलंका का साथ देने का रूस, चीन, पाकिस्तान और कई मुस्लिम देशों ने वादा किया है। लेकिन श्रीलंका सरकार भारत का समर्थन भी चाहती है।

क्रेडिट : पेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Wikipedia

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