पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की नाराजगी से भाजपा की चिंता बढ़ी

केंद्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर सौ दिन से ज्यादा समय से चल रहे किसान आंदोलन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक असर पड़ने और वहां के किसानों की नाराजगी बढ़ने से राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की चिंता बढ़ गई है।

यही वजह है कि भाजपा सरकार और संगठन के लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को साधने के लिए पूरी ताकत से जुट गये हैं, जबकि विपक्षी दलों ने सरकार विरोधी आवाज मुखर करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश का रुख कर लिया है।

एक तरफ कांग्रेस की महासचिव और उत्‍तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जगह-जगह आयोजित होने वाली किसान महापंचायतों में पहुंच कर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही हैं तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अलीगढ़ के टप्पल में पांच मार्च को पहली बार किसान महापंचायत में शामिल होकर केंद्र और राज्‍य सरकार पर जमकर हमला किया। राष्‍ट्रीय लोकदल के चौधरी जयंत सिंह की भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच सक्रियता बढ़ी है और वह भी कृषि कानूनों के मामले को लेकर भाजपा सरकार पर खूब हमलावर दिख रहे हैं। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसानों के विरोध के बाद भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने मीडिया के सामने फफक-फफक कर रोते हुए बयान दिया तो पश्चिम में उनके आंदोलन को नई जमीन मिल गई।

इस बीच भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने पश्चिमी उप्र में किसानों को साधने और उन्हें सरकार और संगठन के प्रमुख लोगों से मिलाने के लिए अभियान शुरू कर दिया है। मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना क्षेत्र के भाजपा विधायक उमेश मलिक शनिवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खापों के चौधरी और किसानों के साथ मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह से आकर मिले। विधायक उमेश मलिक के नेतृत्व में शनिवार को मुख्यमंत्री से मिलने आये प्रतिनिधिमंडल के चौधरी राजेंद्र सिंह मलिक, चौधरी सुभाष बालियान सर्वखाप मंत्री, चौधरी राजवीर सिंह मलिक थाम्बेदार, चौधरी हरवीर सिंह जैसे प्रमुख किसानों की ओर से एक बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया, ‘केंद्र सरकार द्वारा लागू किये गये कृषि कानून किसान हितैषी हैं और यह कानून किसानों को सशक्त करने का प्रयास हैं। इन कानूनों का सबसे ज्यादा लाभ छोटे और सीमांत किसानों को मिलेगा, इसलिये वे इन कानूनों का समर्थन करते हैं।’ हालांकि, भाजपा के ही कुछ प्रमुख लोगों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि किसानों के मन में संशय और गुस्सा है और जो लोग समझ रहे हैं कि कुछ लोगों को साधकर किसानों की आवाज दबा दी जाएगी, तो यह उनकी भूल है।

हरदोई जिले के गोपामऊ क्षेत्र के भाजपा विधायक श्याम प्रकाश ने तो आंदोलन के शुरुआती दिनों में अपने फेसबुक पेज पर कृषि कानूनों में संशोधन की मांग पोस्‍ट की और इसे अपनी निजी राय बताया था। श्याम प्रकाश ने मंगलवार को ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘किसान कानून में संशोधन की बात सबके मन में है लेकिन पार्टी में किसी को कहने की हिम्मत नहीं है।’

उधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान की अगुवाई में प्रमुख भाजपा नेता, किसानों और वहां के प्रतिष्ठित लोगों को साधने में जुटे हैं। दरअसल, फरवरी के आखिरी हफ्ते में केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बीच शामली जिले में किसानों और खाप चौधरियों से बातचीत करने गए केंद्रीय राज्यमंत्री संजीव बालियान और भाजपा के अन्य नेताओं को किसानों की खासी नाराजगी झेलनी पड़ी थी। इस बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विपक्ष की सक्रियता बढ़ गई। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी सात मार्च तक चार बार पश्चिमी उप्र के किसानों की विभिन्न महापंचायत में शामिल हुईं। प्रियंका ने मेरठ में भाजपा पर जमकर हमला बोला और आरोप लगाया कि अंग्रेजों की ही तरह भाजपा सरकार किसानों का शोषण कर रही है।

सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा से जुड़े किसान नेताओं और खास तौर से जाट नेताओं को खाप चौधरी और किसानों के बीच पहुंच कर कृषि कानूनों को लेकर भ्रांतियों को दूर करने की जिम्मेदारी दी है। इसी कड़ी में संजीव बालियान कुछ नेताओं को लेकर फरवरी माह के आखिरी हफ्ते में भैंसवाल गांव पहुँचे थे, जहाँ पर एकत्र हुए किसानों ने बालियान और भाजपा के खिलाफ नारेबाजी की। तब वहां के किसान नेता सवीत मलिक ने कहा था केन्द्रीय मंत्री बालियान समेत भाजपा के कई जनप्रतिनिधि भैंसवाल गाँव में आए थे, जिनका विरोध हुआ और सरकार पहले दिन से इसे चंद किसानों का आंदोलन बताने की भूल कर रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगे के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने भारतीय जनता पार्टी की जमीन मजबूत की लेकिन अब उसी इलाके में भाजपा को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इससे भाजपा नेतृत्व की पेशानी पर बल आ गया है।

वर्ष 2013 में ही अमित शाह को उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रभारी बनाकर भेजा गया और उनके प्रबंधन में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में जीत हासिल की। इसके बाद 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने उप्र में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2017 के विधानसभा चुनाव में किसानों को प्रभावित करने के लिए भाजपा ने कर्जमाफी का सहारा लिया था और मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार की पहली कैबिनेट की बैठक में किसानों की कर्जमाफी का फैसला हुआ था। अब भाजपा के लिए किसान ही सर्वाधिक चुनौती बन रहे हैं।
हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सभाओं में प्राय: यह कहते हैं, ‘‘किसान राज्य सरकार की प्राथमिकता हैं और प्रदेश सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में किसानों की खुशहाली के लिए गंभीरता से प्रयास कर रही है।’

योगी ने यह भी दावा किया है, ‘‘प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा लागू किये गये कृषि कानूनों का लाभ किसानों को मिलेगा। राज्य सरकार किसानों के हितों से जुड़े कार्यक्रमों और योजनाओं को पूरी गंभीरता से लागू कर रही है और इसी का नतीजा है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अन्तर्गत देश में सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन के लिये उत्तर प्रदेश को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया है।’’

क्रेडिट : पेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Wikimedia commons

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