पहचान-पत्र के अभाव में टीकाकरण संबंधी एसओपी के प्रचार-प्रसार के लिए क्या कदम उठाए? अदालत

मुंबई, बंबई उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार से जानना चाहा कि कोविड-19 रोधी टीकाकरण के लिये निर्धारित सात पहचान पत्रों में से अगर किसी व्यक्ति के पास एक भी नहीं है तो केन्द्र की मानक संचालन प्रक्रिया के बारे में ऐसे लोगों को अवगत कराने के लिये क्या कदम उठाये गये हैं।

मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी एस कुलकर्णी ने केंद्र को यह भी बताने के लिये कहा है कि उसके टीकाकरण अभियान के तहत मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग, जिनका कोई कानूनी अभिभावक नहीं है, को टीका लगाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, क्योंकि ऐसे लोग टीका लगवाने के लिए सोच-समझकर रजामंदी देने की स्थिति में नहीं होते हैं।

पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कोविड रोधी टीकों तक नागरिकों की बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने, कोविन पोर्टल के कार्य करने के तरीके में सुधार समेत अन्य मुद्दे उठाए गए थे। याचिकाकर्ताओं ने पीठ को सूचित किया कि सरकार ने कोविन पोर्टल पर टीकाकरण की खातिर पंजीयन करने के लिए सात मान्यता प्राप्त पहचान-पत्रों को निर्धारित किया है जिनमें आधार कार्ड और पैन कार्ड भी शामिल है।

उन्होंने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार ने ऐसे लोगों के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है जिनके पास इनमें से कोई भी पहचान-पत्र नहीं है और ऐसे व्यक्तियों की पहचान करने की जिम्मेदारी तथा उनका टीकाकरण सुनिश्चित करने का जिम्मा राज्य एवं जिला स्तर के अधिकारियों को सौंपा गया है। लेकिन इन एसओपी की जानकारी हर व्यक्ति को नहीं है।

इस पर अदालत ने कहा कि सरकार को टीकों को लेकर जागरूकता और बढ़ानी चाहिए तथा इसके विभिन्न एसओपी के बारे में भी जानकारी देनी चाहिए। उसने कहा, ‘‘टीकाकरण के महत्व से ग्रामीण आबादी को अवगत करवाने के लिए आपने क्या कदम उठाए हैं? टीके के महत्व का संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकार को टीकाकरण से मिलने वाले लाभों का व्यापक प्रचार प्रसार करना चाहिए।

अदालत ने राज्य सरकार की वकील गीता शास्त्री और एएसजी सिंह को निर्देश दिया कि 17 जून को मामले की सुनवाई होने पर उसे इस बारे में उठाये गये कदमों की जानकारी दी जाये।

क्रेडिट : पेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Flickr

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