सीओपी26 शिखर सम्मेलन की विफलता और निराशा के कारणों का आकलन

क्वींसलैंड, दो सप्ताह की सघन बातचीत के बाद, ग्लासगो जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन अंतत: खत्म हो गया है। अंतिम क्षणों में भारत के हस्तक्षेप के बावजूद सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी 197 देशों ने तथाकथित ग्लासगो जलवायु संधि को अपनाया, जिसमें कोयले का इस्तेमाल ‘‘समाप्त करने’’ की बजाय ‘‘कम करने’’ की बात कही गई है।

सीओपी26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने सम्मेलन के समापन के मौके पर दिए अपने भावपूर्ण भाषण में इस बदलाव के लिए माफी मांगी। उनकी माफी ग्लासगो में सीओपी26 के लक्ष्यों की ओर इशारा करती है : आशा है कि यह ऐसे परिणाम देगा जो पेरिस समझौते में तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता के अनुरूप होंगे।

शिखर सम्मेलन की शुरुआत में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने देशों से ‘‘1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बनाए रखने’’, वैश्विक अर्थव्यवस्था के डीकार्बोनाइजेशन में तेजी लाने और कोयले के इस्तेमाल को समाप्त करने का आग्रह किया।

अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या सीओपी26 विफल हो गया? यदि हम शिखर सम्मेलन के मूल बताए गए लक्ष्यों का उपयोग करके इसका मूल्यांकन करते हैं, तो इसका उत्तर हां है, यह वांछित परिणाम तक पहुंचने में नाकाम रहा। दो बड़ी बातों को महसूस नहीं किया गया: 2030 के लिए लक्ष्यों को नये सिरे से निर्धारित करना जो कि वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने में सक्षम हों, और कोयले के इस्तेमाल को समाप्त करने में तेजी लाने पर एक समझौता। लेकिन विफलताओं के बीच, इस सम्मेलन में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए और कुछ उल्लेखनीय उजले पहलू सामने आए। तो आइए एक नजर डालते हैं शिखर सम्मेलन के परिभाषित मुद्दों पर।

कमजोर 2030 लक्ष्य

पेरिस समझौते का लक्ष्य इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करना है, और वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समुद्र के स्तर में वृद्धि अधिक तीव्रतो से होगी और लगातार प्राकृतिक आपदाओं जैसे विनाशकारी प्रभाव सामने आएंगे।

लेकिन क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के नए अनुमानों से पता चलता है कि यदि सीओपी26 के सभी वादे पूरे हो भी जाएं, लेकिन अगर सिर्फ 2030 के लक्ष्य पूरे हो जाते हैं तो ग्रह 2.1 डिग्री सेल्सियस – या 2.4 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होने की राह पर है।

ऑस्ट्रेलिया सरकार की हालिया जलवायु घोषणाओं के बावजूद, इस देश का 2030 लक्ष्य 2015 के समान ही है। यदि सभी देशों ने इस तरह के अल्प-निकट लक्ष्यों को अपनाया, तो वैश्विक तापमान वृद्धि 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के रास्ते पर होगी।

तकनीकी रूप से, 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा अभी भी पहुंच के भीतर है, क्योंकि ग्लासगो संधि के तहत, देशों को एक वर्ष के समय में अपने 2030 लक्ष्यों को अपडेट करने के लिए कहा जाता है। हालांकि, जैसा कि शर्मा ने कहा, ‘‘1.5 की नब्ज कमजोर है’’।

और जैसा कि ऑस्ट्रेलिया के अनुभव से पता चलता है, अंतरराष्ट्रीय दबाव के बजाय घरेलू राजनीति अक्सर जलवायु नीति को चलाने वाली ताकत होती है। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया या अन्य देश 2022 में अधिक बेहतर महत्वाकांक्षा दिखाएंगे।

एक शब्द ने बदले मायने

समझौते में कोयले के इस्तेमाल को समाप्त करने के संबंध में अंतिम शब्द को ‘‘फेज आउट’’ के बजाय ‘‘फेज डाउन’’ में बदलने के लिए भारत के हस्तक्षेप ने कोयले से दूर जाने की तात्कालिकता को कम कर दिया।

चीन और अमेरिका के बाद भारत ग्रीनहाउस गैसों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। देश कोयले पर बहुत अधिक निर्भर करता है, और कोयले से चलने वाले उत्पादन में हर साल 2024 तक 4.6% की वृद्धि होने की उम्मीद है। भारत ‘‘फेज आउट’’ शब्द का सबसे प्रमुख विरोधी था, लेकिन उसे चीन का भी समर्थन प्राप्त था।

और अमेरिकी जलवायु दूत जॉन केरी ने तर्क दिया कि स्रोत पर उत्सर्जन को रोकने और उसका भूमिगत भंडारण करने के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तकनीक को और विकसित किया जा सकता है।

कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जलवायु कार्रवाई के लिए एक विवादास्पद प्रस्ताव है। यह बड़े पैमाने पर सफल सिद्ध नहीं हुआ है, और हम अभी तक नहीं जानते हैं कि भूमिगत संग्रहीत उत्सर्जन अंततः वायुमंडल में वापस आ जाएगा या नहीं। और दुनिया भर में, बड़े पैमाने पर भूमिगत भंडारण करने वाले स्थान भी अपेक्षाकृत कम हैं।

और लागत के मामले में इस महंगी तकनीक के सस्ती अक्षय ऊर्जा के के सामने टिक पाना मुश्किल होगा।

एक महत्वपूर्ण परिणाम में, सीओपी26 ने वैश्विक कार्बन व्यापार के लिए नियमों को भी अंतिम रूप दिया, जिसे पेरिस समझौते के तहत अनुच्छेद 6 के रूप में जाना जाता है। हालांकि नियमों के तहत, जीवाश्म ईंधन उद्योग को अपने कार्बन उत्सर्जन को ‘‘ऑफसेट’’ करने और प्रदूषण जारी रखने की अनुमति दी जाएगी। ‘‘धीमा करने’’ के परिवर्तन के साथ, यह जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को जारी रखेगा।

सब कुछ बुरा हुआ, ऐसा भी नहीं था

कमियों के बावजूद, सीओपी26 ने कई महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणाम भी दिए।

दुनिया ने ऊर्जा के स्रोत के रूप में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को समाप्त करने की दिशा में एक ठोस कदम बढ़ाया है। और 1.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग लक्ष्य ने महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है, इस मान्यता के साथ कि इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 2010 के स्तर के सापेक्ष 2030 तक 45% की तीव्र, गहरी और निरंतर उत्सर्जन में कमी की आवश्यकता होगी।

इसके अलावा, यह समझौता वनों और जैव विविधता की रक्षा सहित प्रकृति और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण के महत्व पर जोर देता है। यह ऑस्ट्रेलिया और 123 अन्य देशों द्वारा 2030 तक वनों की कटाई को समाप्त करने का वादा करने वाले करार के शीर्ष पर आता है।

यह समझौता देशों से जलवायु क्षति की चपेट में आने वाले विकासशील देशों को पांच साल के लिए प्रति वर्ष 100 अरब अमेरिकी डॉलर देने के एक उत्कृष्ट वादे को पूरी तरह से पूरा करने का भी आग्रह करता है। यह वादों को लागू करने में पारदर्शिता के महत्व पर भी जोर देता है।

इसके माध्यम से 2022 के अंत तक पेरिस समझौते के अनुरूप तापमान लक्ष्य को पूरा करने के लिए आवश्यक 2030 लक्ष्यों को फिर से देखने और मजबूत करने के लिए राष्ट्रों को भी आमंत्रित किया जाता है। इसके समर्थन में, 2030 तक हर साल एक उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय गोलमेज बैठक आयोजित करने पर भी सहमति हुई।

अमेरिका और चीन का जलवायु समझौता भी सतर्क आशावाद का कारण है।

1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य के लिए दुनिया के पटरी पर नहीं होने के बावजूद, गति सही दिशा में आगे बढ़ रही है। और तथ्य यह है कि अंतिम समझौते में कोयले के इस्तेमाल को कम करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है। लेकिन यह देखना है कि हमने विनाशकारी जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए यह जो छोटी खिड़की छोड़ दी है, वह कहीं देशों को इससे बच निकलने का रास्ता तो नहीं बन जाएगी।

क्रेडिट : पेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Getty Images

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