नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए बुधवार को कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह हफ़्ते का समय दिया जिसमें उपभोक्ताओं को उत्पादों के वितरकों और विक्रेताओं की जानकारी के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता शुद्धता एवं प्रमाणन की जानकारी का ‘‘अधिकार’’ दिये जाने का अनुरोध किया गया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया था कि ग्राहकों के लिए सही जानकारी के आधार पर फ़ैसले लेने और अनुचित या प्रतिबंधात्मक व्यापारिक तौर-तरीकों और अनैतिक शोषण से खुद को बचाने के लिए ‘‘जानने का अधिकार’’ बहुत जरूरी है। शीर्ष अदालत ने पिछले साल जुलाई में इस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई थी और केंद्र विभिन्न राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य से जवाब तलब किया था। याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पीठ को अवगत कराया कि उन्हें अब तक सिर्फ़ कुछ राज्यों से ही जवाब मिले हैं जिनमें हरियाणा पंजाब बिहार असम और केंद्र शासित प्रदेश अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। पीठ ने कहा ‘‘जिन प्रतिवादियों ने अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया है उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए छह हफ़्ते का समय दिया जाता है…।’’
न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए तीन महीने बाद की तारीख तय की। वकील अश्विनी कुमार दुबे के जरिये दायर इस याचिका में केंद्र और राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि हर वितरक व्यापारी और दुकानदार अपने पंजीकरण की जानकारी जैसे- नाम पता फ़ोन नंबर और कर्मचारियों की संख्या प्रवेश द्वार पर एक ऐसे ‘डिस्प्ले बोर्ड’ पर साफ और बड़े अक्षरों में अंकित करे जो लोगों को आसानी से दिख सके।
याचिका में कहा गया है कि अगर किसी ग्राहक को किसी उत्पाद या सेवा से कोई समस्या होती है तो शिकायत दर्ज करने और उपभोक्ता निवारण मंच के जरिये समाधान पाने के लिए वितरक डीलर और विक्रेता की जानकारी होना ज़रूरी है। इसमें मुख्य रूप से यह कहा गया है कि ‘‘जानने का अधिकार’’ ग्राहकों को जानकारी पाने या सुरक्षित रहने और खरीद-बिक्री एवं पैसों के लेन-देन के दौरान सही फ़ैसले लेने में सक्षम बनाता है।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common