लंदन, जब इस गर्मी में ब्रिटेन भीषण उष्णलहर की चपेट में रहा तब टेलीविजन स्टूडियो और रेडियो कार्यक्रमों में बार-बार एक ही सवाल पूछा गया-‘‘क्या इस उष्णलहर की वजह जलवायु परिवर्तन है ’’ उष्णलहर कोई नयी घटना नहीं है। यह मौसम का एक स्वाभाविक चक्र है जो लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों के कारण पैदा होता है। जिस प्रकार वर्ष 1976 की ऐतिहासिक गर्मी जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं आई थी उसी प्रकार जून 2026 की उष्णलहर भी जलवायु परिवर्तन की प्रत्यक्ष देन नहीं है। असल सवाल यह नहीं है कि उष्णलहर का कारण जलवायु परिवर्तन है या नहीं बल्कि यह है कि कोयला तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से वातावरण में बढ़ी ग्रीनहाउस गैस ने इन उष्णलहरों को कितना अधिक गर्म और खतरनाक बना दिया है।
इसी विषय का अध्ययन कारण-निर्धारण विज्ञान (एट्रिब्यूशन साइंस) करता है। यह विज्ञान यह समझने का प्रयास करता है कि वातावरण में अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसों के कारण किसी उष्णलहर की तीव्रता कितनी बढ़ गई। इसने चरम मौसमी घटनाओं को समझने के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बदल दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय पर सार्वजनिक विमर्श भी विज्ञान के अनुरूप आगे बढ़े। जलवायु परिवर्तन पर होने वाली चर्चा में जिस बात की सबसे अधिक अनदेखी होती है वह ‘‘मानव-जनित जलवायु परिवर्तन’’ नहीं बल्कि ‘‘जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन’’ है।
आज आने वाली हर उष्णलहर ऐसे वातावरण में विकसित होती है जो सौ वर्ष पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म है और जिसमें ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी कहीं अधिक है। यही कारण है कि आज की प्रत्येक उष्णलहर अतिरिक्त उत्सर्जन न होने की स्थिति की तुलना में अधिक गर्म होती है। हमारे शोध से यह तथ्य स्पष्ट होता है। जब हमने 1976 में ब्रिटेन में आई उष्णलहर जैसी ही वायुमंडलीय परिस्थितियों को आज की जलवायु में दोबारा तैयार किया तो पाया कि अधिकतम तापमान लगभग तीन से चार डिग्री सेल्सियस अधिक था।
मौसम का स्वरूप वही था लेकिन जिस जलवायु में वह घटना घटित हुई वह बदल चुकी थी। जलवायु परिवर्तन उष्णलहर पैदा नहीं करता बल्कि उसके लिए परिस्थितियों को अधिक अनुकूल बना देता है। उष्णलहर आएगी या नहीं यह अब भी मौसम की स्वाभाविक परिवर्तनशीलता तय करती है लेकिन जीवाश्म ईंधनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैस उसे अधिक गर्म अधिक तीव्र रिकॉर्ड तोड़ने वाली तथा स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे दोनों के लिए अधिक नुकसानदेह बना देती हैं।
इसके पीछे का विज्ञान बेहद सरल है। वातावरण को राजनीति से कोई सरोकार नहीं होता। वह केवल ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। कोयला तेल और गैस के उपयोग से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का प्रत्येक अतिरिक्त टन वातावरण में जुड़ता है और चरम मौसमी घटनाओं के अधिक विनाशकारी होने की आशंका बढ़ा देता है। वर्ष 2026 में यूरोप में पड़ी रिकॉर्ड तोड़ उष्णलहर और जंगलों में लगी भीषण आग इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का दूर का खतरा नहीं रह गया है। उसका असर आज हमारे आसपास के मौसम में साफ दिखाई दे रहा है। राजनीति या सार्वजनिक बहस चाहे जैसी भी हो वातावरण ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के अनुरूप ही प्रतिक्रिया करता रहेगा।
आज जिस जलवायु में हम रह रहे हैं वह हमारे जीवनकाल की सबसे कम चरम जलवायु है क्योंकि जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन अब भी जारी है। अब समय आ गया है कि जलवायु परिवर्तन पर सार्वजनिक विमर्श वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप हो। यदि हम भविष्य में तापमान वृद्धि को सीमित करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं तो हमें जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन में तेजी से कमी लानी होगी। साथ ही अपने घरों बुनियादी ढांचे और समुदायों को उस जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बनाना होगा जिसकी आहट हम आज ही महसूस कर रहे हैं।क्रडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common