डबलिन (आयरलैंड), आज तक जिन भी प्राचीन भाषाओं को पढ़ा और समझा जा सका है उनके रहस्य सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं को किसी न किसी आधार का सहारा मिला है। आमतौर पर यह आधार कोई द्विभाषी अभिलेख होता है जैसे रोसेटा स्टोन या फिर उससे मिलती-जुलती कोई ज्ञात भाषा जिससे तुलना की जा सके लेकिन कांस्य युग में यूनान के क्रीट द्वीप पर विकसित मिनोअन सभ्यता की लिपि ‘लीनियर ए’ के साथ ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
‘लीनियर ए’ को भाषाविज्ञान में ‘असंबद्ध भाषा’ माना जाता है क्योंकि इसका किसी ज्ञात जीवित या विलुप्त भाषा से अबतक कोई प्रमाणित संबंध स्थापित नहीं हो सका है। यही कारण है कि पिछले एक शताब्दी से यह भाषाविदों के लिए सबसे कठिन पहेलियों में से एक बनी हुई है। इसी तरह रोमन साम्राज्य के उदय से पहले प्रचलित रही इटली की ‘एट्रस्कन’ भाषा को समझने में भी केवल सीमित सफलता मिली है। कब्रों पर मिले छोटे-छोटे अभिलेखों के आधार पर इसका कुछ शब्दकोश तैयार किया जा सका है लेकिन इसकी व्याकरण और गहरे अर्थ अब भी भाषाविदों की पकड़ से बाहर हैं। यही वे भाषाएं हैं जिनकी पहेली सुलझाने में अब कृत्रिम मेधा (एआई) को भी शामिल किया जा रहा है। हालांकि एआई भाषाविदों की जगह नहीं ले रहा बल्कि उनके अनुमानों की जांच को कहीं अधिक तेज और व्यापक बना रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एआई वह कर पाएगा जो एक सदी के मानवीय प्रयासों के बावजूद अबतक संभव नहीं हो सका हाल का एक उदाहरण इस संभावना और उसकी सीमाओं दोनों को सामने लाता है। जून 2026 में कृत्रिम मेधा के जानकार और शौकिया भाषाविद ने दावा किया कि उसने ‘लीनियर ए’ को समझने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। इसकी शुरुआत उसने एक अनुमान से की कि एक प्रार्थना संबंधी अभिलेख में प्रयुक्त एक अज्ञात शब्द किसी सामी भाषा की उस मूल धातु से निकला हो सकता है जिसका अर्थ ‘‘बसना’’ या ‘‘निवास करना’’ होता है।
इसके बाद उसने कृत्रिम मेधा से तैयार प्रोग्रामिंग स्क्रिप्ट की मदद से इस ध्वनि-पैटर्न की तुलना ‘लीनियर ए’ के उपलब्ध समूचे अभिलेख-संग्रह से की। उसके अनुसार वह 40 संकेतों का ध्वनि-रूप निर्धारित करने और 408 शब्दों का एक कोश तैयार करने में सफल रहा। उसके दावे के मुताबिक ‘लीनियर ए’ वास्तव में सामी भाषा परिवार की एक विलुप्त भाषा है जिसमें हिब्रू और अरामाइक जैसी भाषाएं शामिल हैं। यह समझना जरूरी है कि इस मामले में कृत्रिम मेधा ने क्या किया और क्या नहीं किया। मूल विचार एआई का नहीं बल्कि उस तकनीकी जानकार का था। एआई ने केवल एक शोध सहायक की भूमिका निभाई। उसने मानवीय अनुमान के हजारों संकेतों के साथ बहुत तेजी से तुलना कर उसकी जांच की। यही काम यदि कोई व्यक्ति हाथ से करता तो उसे महीनों लग सकते थे।
फिलहाल कृत्रिम मेधा और मनुष्य के बीच यही कार्य-विभाजन सबसे महत्वपूर्ण है न कि कोई ऐसा दावा जिसकी अब भी विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जा रही है। तो आखिर एआई कहां सबसे अधिक उपयोगी साबित होता है और कहां उसकी सीमाएं सामने आ जाती हैं बड़े पैमाने पर पैटर्न की जांच करने में उसकी क्षमता असाधारण है। किसी संकेत या शब्द के बारे में लगाए गए अनुमान की वह पूरे अभिलेख-संग्रह में कुछ ही मिनटों में जांच कर सकता है जिसमें मनुष्य को वर्षों लग सकते हैं। वह ऐसे दोहराए जाने वाले क्रम भी पहचान सकता है जो सामान्यतः मानवीय नजर से छूट जाते हैं। इतना ही नहीं वह क्षतिग्रस्त या अधूरे अभिलेखों में संभावित लुप्त संकेतों का अनुमान लगाकर उन्हें पुनर्निर्मित करने में भी मदद कर सकता है। कृत्रिम मेधा की एक और विशेष क्षमता ‘अंतर-भाषीय अंतरण’ है। इसमें किसी ज्ञात भाषा पर प्रशिक्षित मॉडल कभी-कभी उससे निकट संबंध रखने वाली किसी अज्ञात भाषा के पैटर्न का भी अनुमान लगा सकता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यदि आपको स्पेनिश भाषा आती है तो पुर्तगाली के कुछ शब्द और संरचनाएं सहज ही समझ में आने लगती हैं।
शोधकर्ता इस पद्धति का सफल उपयोग उगारिटिक जैसी लिपियों पर कर चुके हैं जहां भाषा-परिवार पहले से ज्ञात है। उगारिटिक एक विलुप्त सामी भाषा थी जो कांस्य युग के अंत (लगभग 1300-1190 ईसा पूर्व) में प्राचीन तटीय नगर उगारिट (वर्तमान सीरिया) में बोली जाती थी। लेकिन यहां एक बड़ी रुकावट भी है। केवल सांख्यिकीय पैटर्न की पहचान के आधार पर किसी भाषा का अर्थ नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए किसी ज्ञात भाषा या द्विभाषी अभिलेख जैसे ठोस आधार की आवश्यकता होती है जिससे यह तय किया जा सके कि कौन-सा पैटर्न वास्तव में अर्थपूर्ण है और कौन-सा केवल संयोग। जब तक ‘लीनियर ए’ या ‘एट्रस्कन’ के लिए ऐसा कोई आधार उपलब्ध नहीं हो जाता तब तक प्राचीन भाषाओं को समझने में कृत्रिम मेधा की भूमिका एक तेज सक्षम और उपयोगी सहायक भर रहेगी।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common