क्या बीजिंग दुनिया का ‘नया केंद्र’ है? चीन सुर्खियों में बना हुआ है पर उसके प्रभाव भी सीमित

एडिलेड,  हाल के हफ्तों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगातार बीजिंग यात्राओं ने चीन को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के लिए ये शिखर बैठकें इस बात का संकेत थीं कि चीन अब “कुछ ही दिनों के भीतर दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों की मेजबानी करने में सक्षम एक स्थिर ताकत” बन चुका है। उनके मुताबिक  चीन खुद को “महाशक्तियों के बीच मध्यस्थ” और “वैश्विक स्थिरता के स्तंभ” के रूप में पेश कर रहा है।

            कई अन्य विश्लेषकों का मानना है कि इन यात्राओं ने यह दर्शाया कि चीन अब एक “अनिवार्य वैश्विक शक्ति” बनता जा रहा है और राष्ट्रपति शी चिनफिंग ऐसे विश्व नेता के रूप में उभर रहे हैं  जिनकी बिल्कुल भी अनदेखी नहीं की जा सकती और जिनसे संबंध बनाए रखना जरूरी समझा जा रहा है।

            इस बीच  चीनी विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया कि पिछले छह महीनों में फ्रांस  ब्रिटेन  कनाडा  दक्षिण कोरिया और जर्मनी समेत कई देशों के नेता बीजिंग आ चुके हैं।

            महत्वपूर्ण बात यह रही कि इनमें कुछ नेता लंबे अंतराल के बाद चीन पहुंचे। उदाहरण के लिए  किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की यह आठ वर्षों बाद पहली चीन यात्रा थी। वहीं  कनाडा  दक्षिण कोरिया और अमेरिका के नेताओं की यह नौ वर्षों बाद पहली यात्रा थी।

            एक के बाद एक हो रही इन यात्राओं के बीच चीनी मीडिया ने बीजिंग को दुनिया का ऐसा “केंद्र” बताया  जो अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों में स्थिरता प्रदान कर रहा है। एक अन्य शीर्षक में लिखा गया— “दुनिया अब ‘बीजिंग टाइम’ में प्रवेश कर रही है।”

            यह निश्चित रूप से बीजिंग के लिए वैश्विक मंच पर बड़ा क्षण रहा है  लेकिन इन व्याख्याओं में तीन महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज हो जाते हैं।

            पहला  यह अभी स्पष्ट नहीं है कि विश्व नेता सक्रिय चीनी कूटनीति के कारण बीजिंग जा रहे हैं या फिर ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।

            मसलन  जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जनवरी में बीजिंग पहुंचे तो इसे व्यापक रूप से अमेरिका पर कनाडा की आर्थिक निर्भरता और ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल की अनिश्चितताओं के जवाब के रूप में देखा गया। कुछ मीडिया खबरों में कहा गया कि कार्नी अमेरिका से बेहतर शर्तों पर बातचीत के लिए “चीन कार्ड” खेल रहे थे।

            दूसरा  बीजिंग अपने इस “केंद्र” में आने वालों से बड़ी राजनीतिक कीमत भी वसूलता है। कई बार ये शिखर बैठकें आने वाले नेताओं की महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों से जुड़ी रही हैं।

            उदाहरण के लिए  ट्रंप की बीजिंग यात्रा के दौरान उन्होंने पूर्व के उन बयानों से पीछे हटने के संकेत दिए  जिनमें अमेरिका में कृषि भूमि खरीदने से चीनी नागरिकों को रोकने और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में चीनी छात्रों की संख्या सीमित करने की बात कही गई थी।

            चीन की मीडिया ने इस बात को प्रमुखता से दिखाया कि ट्रंप के इन कदमों पर उनके “मेक अगेन ग्रेट अमेरिका” समर्थकों और अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने नाराजगी जताई।

            इसी तरह  कार्नी की चीन यात्रा के बाद एक व्यापार समझौता हुआ जिसके तहत चीन में बने इलेक्ट्रिक वाहनों पर कनाडा का शुल्क घटाकर सालाना पहले 49 हजार वाहनों के लिए 6.1 प्रतिशत कर दिया गया। इससे पहले 2024 के अंत में कनाडा ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाया था। हालांकि  कुछ महीनों बाद 2025 के चुनाव अभियान के दौरान कार्नी ने चीन को “भू-राजनीतिक दृष्टि से सबसे बड़ा खतरा” बताया।

            तीसरा  विदेशी नेताओं की इन यात्राओं से चीन की मूल विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव आता नहीं दिखा। उदाहरण के लिए  यूरोपीय नेताओं की अपीलों के बावजूद रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस को चीन का समर्थन कम नहीं हुआ और न ही यूरोपीय संघ के साथ उसका भारी व्यापार अधिशेष घटा है।

            इसी तरह  ट्रंप द्वारा शी चिनफिंग की नेतृत्व क्षमता की प्रशंसा करने और ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने के फैसले के बावजूद चीन ने ईरान के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन की मदद करने पर सहमति नहीं दी।

            यहां तक कि व्लादिमीर पुतिन भी “पावर ऑफ साइबेरिया-2” गैस पाइपलाइन परियोजना को लेकर चीन के साथ मतभेद दूर नहीं कर सके। यह परियोजना लंबे समय से पुतिन की प्राथमिकता रही है। यदि यह पाइपलाइन बनती है  तो इसके जरिए हर साल रूस से चीन को 50 अरब घन मीटर प्राकृतिक गैस भेजी जा सकेगी  जो 2025 में चीन की कुल गैस खपत का लगभग 12 प्रतिशत होगी।

क्रडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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