बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल : अलग-अलग सलाह से माता-पिता में बढ़ सकता है तनाव: शोध

मेलबर्न, बच्चों को किस उम्र में स्क्रीन का इस्तेमाल शुरू करना चाहिए उन्हें कितनी देर तक स्क्रीन देखने देना चाहिए क्या सोने से पहले स्क्रीन से दूरी जरूरी है क्या स्क्रीन अधिक देर तक देखने वाले बच्चों की एकाग्रता जल्दी भंग हो सकती है, बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर दी जाने वाली अलग-अलग और कई बार विरोधाभासी सलाह माता-पिता के लिए तनाव और असमंजस का कारण बन सकती हैं।

एक नए शोध में दावा किया गया है कि छोटे बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर सलाह अब केवल उनकी उम्र और स्क्रीन देखने की अवधि तक सीमित नहीं है बल्कि इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल कब और कैसे करें। कई वर्षों तक माता-पिता को सलाह दी जाती थी कि वे दो साल की उम्र तक बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें और इसके बाद स्क्रीन देखने का समय प्रतिदिन दो घंटे तक सीमित करें। हालांकि इस सलाह की आलोचना इस आधार पर हुई है कि इसमें सभी बच्चों और स्क्रीन के इस्तेमाल के अलग-अलग तरीकों को एक जैसा माना जाता है। साथ ही इसमें खेल और सामाजिक संपर्क जैसे सकारात्मक पहलुओं को भी नजरअंदाज किया जाता है।

शोध में जन्म से आठ वर्ष तक के बच्चों और स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर सार्वजनिक चर्चाओं का विश्लेषण किया गया। इसके लिए आधिकारिक दिशानिर्देशों सोशल मीडिया सामग्री ऑस्ट्रेलियाई समाचारों ऑनलाइन लेखों और बच्चों से जुड़ी वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रचार का अध्ययन किया गया। इसके अलावा 34 माता-पिता से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की गई कि उन्हें किस तरह की सलाह मिलती है और उसका उन पर क्या असर पड़ता है।

शोध में पाया गया कि अब माता-पिता को भोजन के समय और सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करने देने अन्य गतिविधियों के दौरान स्क्रीन को पृष्ठभूमि में चालू नहीं रखने और बच्चों को धीमी गति वाली सामग्री दिखाने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा माता-पिता से कहा जाता है कि वे बच्चों को अकेले स्क्रीन देखने देने के बजाय उनके साथ बैठकर कार्यक्रम देखें उन्हें चीजें समझाएं गाने के साथ गाएं और बीच-बीच में सवाल पूछें।

शोध के अनुसार इन सलाहों का उद्देश्य अच्छा है लेकिन इनसे माता-पिता पर दबाव बढ़ सकता है। एक ओर उन्हें बताया जाता है कि स्क्रीन का सीमित इस्तेमाल ठीक है वहीं दूसरी ओर चेतावनी दी जाती है कि इससे मस्तिष्क के विकास और शारीरिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा बच्चों के लिए सही सामग्री चुनना भी चुनौती बन गया है। उदाहरण के लिए माता-पिता को अधिक उत्तेजना पैदा करने वाले कार्यक्रमों के बजाय कम उत्तेजना वाले कार्यक्रम दिखाने की सलाह दी जाती है लेकिन यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सा कार्यक्रम किस श्रेणी में आता है। माता-पिता को अब केवल स्क्रीन देखने के समय पर नजर नहीं रखनी होती बल्कि बच्चों के लिए बेहतर सामग्री चुनने और उनके साथ बैठकर कार्यक्रम देखने का समय भी निकालना पड़ता है। इससे वे थकान और अपराधबोध महसूस कर सकते हैं।

शोध में कहा गया है कि सभी परिवारों पर एक जैसी सलाह लागू नहीं की जा सकती। बच्चों की पसंद और व्यवहार अलग-अलग होते हैं। परिवारों की जीवनशैली और परिस्थितियां भी अलग होती हैं। उदाहरण के लिए कुछ अकेले बच्चों की परवरिश कर रहे माता-पिता के लिए बच्चों को कुछ समय अकेले कार्यक्रम देखने देना राहत देने वाला हो सकता है। शोधकर्ता ने कहा कि स्क्रीन के इस्तेमाल का कोई एक सही तरीका नहीं है। उन्होंने लगभग एक ही उम्र के छोटे बच्चों वाले दो परिवारों का उदाहरण दिया। एक परिवार सुबह टीवी नहीं देखने देता था जबकि दूसरे परिवार में टीवी केवल सुबह ही देखा जाता था।

दोनों परिवारों ने अलग-अलग तरीके आजमाने के बाद अपने लिए सही व्यवस्था तय की। शोध के अनुसार माता-पिता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि स्क्रीन देखने से उनके बच्चे के व्यवहार पर क्या असर पड़ता है और क्या इससे खेलकूद तथा अन्य जरूरी गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय बचता है। इसमें कहा गया है कि स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर तय नियमों का आंख मूंदकर पालन करने के बजाय यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि बच्चा स्क्रीन के साथ और उसके बिना भी ठीक से खेल रहा है सीख रहा है और खुश है या नहीं।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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