जयपुर, राजस्थान के राजसमंद जिले में महिलाओं का एक समूह मिट्टी और जैविक खाद से तैयार ‘सीड्स बॉल’ के जरिए अरावली की पथरीली और बंजर पहाड़ियों में हरियाली फैलाने की मुहिम चला रहा है। कॅरियर संस्थान राजसमंद कॅरियर महिला मंडल देवगढ़ मेरा युवा भारत राजसमंद और नगर पालिका देवगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे इस अभियान में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की महिलाएं बारिश के दौरान दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचकर पारंपरिक गुलेल की मदद से सीड्स बॉल का छिड़काव करती हैं। इस अभियान का उद्देश्य प्राकृतिक तरीके से वन क्षेत्र को बढ़ावा देना तथा जंगल की आग और अन्य कारणों से प्रभावित पहाड़ियों पर हरियाली लौटाना है।
‘पेड़ वुमन’ के रूप में पहचान रखने वाली भावना पालीवाल ने देवगढ़ और राजसमंद की महिलाओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भावना ने पीटीआई-भाषा से कहा “यह अभियान पिछले आठ वर्षों से लगातार चलाया जा रहा है और इस दौरान राजसमंद आमेट भीम देवगढ़ कुम्भलगढ़ टॉडगढ़ सातपालिया और दिवेर सहित आसपास के कई क्षेत्रों में 1.5 लाख से अधिक सीड्स बॉल का छिड़काव किया जा चुका है।” महिलाओं का पर्यावरण से जुड़ाव केवल बीज बिखेरने तक सीमित नहीं है।
वे पेड़ों और पर्यावरण के साथ भावनात्मक और पारिवारिक रिश्ता भी बनाती हैं। अभियान के तहत महिलाएं जंगलों में जाकर पेड़ों को रक्षासूत्र बांधती हैं और उनकी रक्षा का संकल्प लेती हैं। भावना ने कहा “अभियान से जुड़ी महिलाएं घर के कामकाज के बाद अपना समय पर्यावरण संरक्षण के लिए देती हैं। वे कई किलोमीटर पैदल चलकर दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों तक पहुंचती हैं। वहां गुलेल के जरिए सीड्स बॉल को दूर तक पहुंचाया जाता है।” भावना ने बताया कि बारिश के मौसम में महिलाएं अलग-अलग क्षेत्रों में बंटकर हाथों में गुलेल थामती हैं और उन ऊंची चोटियों तक बीज पहुंचाती हैं जहां इंसान का पहुंचना बेहद जोखिम भरा होता है। अभियान की जिला प्रभारी मीनल पालीवाल ने बताया कि सीड्स बॉल में मिट्टी गोबर और जैविक मिश्रण के साथ विभिन्न स्थानीय प्रजातियों के बीज रखे जाते हैं।
उनके अनुसार गुलेल की मदद से इन्हें काफी दूर तक पहुंचाया जा सकता है। बारिश की बूंदें जब सीड्स बॉल पर पड़ती हैं तो उसकी परत धीरे-धीरे गल जाती है और बीज अंकुरित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जंगल की आग से प्रभावित और वनस्पति विहीन क्षेत्रों में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है। सीड्स बॉल बीजों को शुरुआती चरण में तेज धूप पक्षियों और कीटों से सुरक्षा भी प्रदान करती हैं।मीनल ने कहा “अभियान की एक और अनुकरणीय बात यह है कि महिलाएं घर में खाए जाने वाले फलों के बीजों जैसे नीम जामुन इमली आम अनार अमरूद और पपीता आदि को कचरे में नहीं फेंकतीं।
उन्हें सहेजकर वापस उपयोग में लाया जाता है। साथ ही सीड्स बॉल के भीतर स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल नीम पीपल रोहिड़ा शीशम और करंज जैसी मजबूत प्रजातियों के बीज रखे जाते हैं।” उनके अनुसार इस वर्ष खनन से प्रभावित पहाड़ियों गहरी घाटियों वन्यजीव क्षेत्रों और पंचायत स्तर पर उपलब्ध बंजर भूमि को भी अभियान में शामिल किया जा रहा है।
इस पहल को लेकर भावना ने कहा “पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय लोगों की भागीदारी और छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।” उन्होंने बताया कि इस वर्ष अभियान के तहत 50 000 बीजों के रोपण का लक्ष्य रखा गया है। अभियान से अब तक हजारों विद्यार्थी युवा ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी जुड़ चुके हैं। अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर विशेष कार्यशालाएं प्रशिक्षण शिविर और प्रेरणादायक आयोजन भी किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि अब तक हजारों महिलाओं और स्कूली बच्चों को सीड्स बॉल बनाने तथा गुलेल से सही निशाना लगाकर बीजारोपण करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
भावना के अनुसार सीड्स बॉल तकनीक केन्या से प्रेरित है और इसे राजस्थान की स्थानीय जलवायु तथा परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया गया है। उनके अनुसार केन्या में इस तकनीक के जरिए बड़े स्तर पर भूमि पर हरियाली लौटाने के प्रयास किए गए हैं।उन्होंने कहा कि पारंपरिक पौधारोपण की तुलना में सीड्स बॉल तकनीक कम खर्चीली है। एक सीड्स बॉल की औसत लागत करीब दो रुपये है और इसकी सफलता दर लगभग 70 प्रतिशत तक बताई गई है। भावना के अनुसार राजसमंद आमेट भीम देवगढ़ और कुम्भलगढ़ जैसे क्षेत्रों में सीड्स बॉल अभियान के जरिए बंजर इलाकों में हरियाली लौटाने के प्रयास किए जा रहे हैं।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common