लंदन, किसी भी सुपरमार्केट में कदम रखते ही आप चारों ओर कार्बन से घिरे होते हैं। यह वह कार्बन नहीं है जिसे जलवायु रिपोर्टों में पीपीएम यानी ‘पार्ट्स पर मिलियन’ में मापा जाता है बल्कि यह कार्बन का सबसे ठोस रूप है। शैम्पू की बोतल की पॉलीमर परत छत की टाइलों के पीछे की इन्सुलेशन और आपके बैग में प्रयुक्त सिंथेटिक फाइबर… कार्बन ही तो है। ये वस्तुएं जीवश्म ईंधन युग की अनजानी उपज नहीं हैं। ये इसके “दूसरे चरण” का हिस्सा हैं जो जलने जितना स्पष्ट नहीं है लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है। वैश्विक नेट-जीरो चर्चा लगभग पूरी तरह ऊर्जा तक ही सीमित रही है। यह दृष्टिकोण आवश्यक है लेकिन इसके पीछे एक मान्यता है जिसे शायद ही कभी जांचा जाता है: कि जीवाश्म ईंधन से मिलने वाली केवल वही चीज़ महत्वपूर्ण है जो जलने पर ऊर्जा के रूप में निकलती है। वास्तव में लगभग 15-20 प्रतिशत जीवाश्म ईंधन कभी जलाया ही नहीं जाता।
यह आधुनिक जीवन की भौतिक संरचना में बदल जाता है: प्लास्टिक पॉलीमर उर्वरक चिपकने वाले पदार्थ सॉल्वेंट और सिंथेटिक वस्त्र। जब ये उत्पाद जलाए अपघटित किए या त्यागे जाते हैं तो उनका कार्बन वातावरण में लौटता है जो वैश्विक गर्मी में योगदान देता है। यह योगदान वास्तविक है बढ़ रहा है और अधिकांश मुख्यधारा के नेट-जीरो लेखांकन में लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है। सिर्फ हरित ऊर्जा संक्रमण ही पर्याप्त नहीं है सामग्री परिवर्तन को भी सतत होना चाहिए। लेकिन इस समस्या के केंद्र में स्थित तीन उद्योग अक्सर नजरअंदाज किए जाते हैं: रसायन निर्माण प्लास्टिक पॉलीमर और निर्माण उद्योग। रासायनिक उद्योग आधुनिक सामग्री का एक तरह से इंजन है।
यह वैश्विक तेल की लगभग 14 प्रतिशत और वैश्विक गैस की लगभग 8 प्रतिशत मांग का उपयोग करता है। इसका अधिकांश हिस्सा ईंधन के रूप में नहीं बल्कि कच्चे माल के रूप में प्रयोग होता है। अमोनिया प्राकृतिक गैस से हबर-बॉश नामक एक शताब्दी पुरानी प्रक्रिया के माध्यम से बनाया जाता है जो उर्वरकों का आधार है जो विश्व की आधी आबादी को भोजन देता है। कच्चे तेल से एथिलीन निकलता है जो प्लास्टिक सॉल्वेंट और कोटिंग्स के लिए शुरुआती बिंदु है। इस उद्योग का मूल कार्य कार्बन को संसाधित करना है। विश्व में हर साल लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है जिसमें से लगभग सभी फॉसिल फीडस्टॉक से बने होते हैं। केवल लगभग 9 प्रतिशत ही कभी पुनर्नवीनीकरण होते हैं। शेष को जलाया जाता है लैंडफिल में भेजा जाता है या वह पर्यावरण में खो जाता है।
हर रास्ता विभिन्न गति से फॉसिल कार्बन को वातावरण में वापस लाता है। इसे कार्बन चक्र कहा जा सकता है। निर्माण उद्योग में अधिक संभावना है। इमारतें 50 से 100 साल तक टिक सकती हैं इसलिए उनके निर्माण सामग्री में कार्बन दशकों तक बंद रखा जा सकता है। लकड़ी उदाहरण के तौर पर ली जा सकती है: पेड़ बढ़ते समय कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और इसे लकड़ी में स्टोर करते हैं। यही विचार इंजीनियरिंग सामग्री तक भी बढ़ाया जा सकता है।
कृषि और वन अवशेष (जैसे फसल अवशेष टहनी और पत्तियां) को बायोचार में बदला जा सकता है जो एक स्थिर कोयला-जैसा रूप है और इसे एग्रीगेट या कंक्रीट बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। कार्बन डाइऑक्साइड को तकनीकों के माध्यम से कैप्चर किया जा सकता है और फिर इसे निर्माण उत्पादों इन्सुलेशन सामग्री सहित अन्य निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है। हर मामले में कार्बन को केवल अपशिष्ट के रूप में नहीं देखा जाता यह दीर्घायु इमारतों और बुनियादी ढांचे का हिस्सा बन जाता है। समाधान यह नहीं है कि उद्योग से कार्बन को पूरी तरह हटा दिया जाए बल्कि यह है कि फॉसिल कार्बन को स्वत: कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करना बंद किया जाए।
रसायन प्लास्टिक और निर्माण उत्पादों में अभी कार्बन की आवश्यकता होगी लेकिन वह कार्बन हमेशा तेल गैस या कोयले से नहीं आना चाहिए। यह पौधों पर आधारित स्रोतों या कृषि और वन से उत्पन्न अपशिष्ट से भी आ सकता है साथ ही अन्य सतत रूप से प्राप्त पौधों की सामग्री से भी। यह कार्बन उन औद्योगिक प्रक्रियाओं से कैप्चर की गई कार्बन मोनोऑक्साइड से भी आ सकता है जिन्हें वातावरण में जाने से पहले रोका गया हो।
सावधानीपूर्वक उपयोग किए जाने पर ये कार्बन स्रोत पॉलीमर निर्माण उत्पादों इन्सुलेशन सामग्री और रसायनों में फॉसिल फ्यूल आधारित कार्बन का विकल्प बन सकते हैं। इन विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन यह सुनिश्चित करेगा कि ये वास्तव में उत्पाद के पूरे जीवन चक्र में उत्सर्जन को कम करें। इसमें यह देखा जाता है कि कार्बन कहां से आया इसे निकालने में कितनी ऊर्जा लगी क्या भूमि पर पर्यावरणीय नुकसान टाला गया कार्बन उत्पाद में कितनी देर तक बना रहता है और उत्पाद के जीवन के अंत में क्या होता है।
एक सवाल यह है कि कैप्चर किए गए कार्बन का प्रबंधन कैसे किया जाना चाहिए। इस कार्बन को स्थायी रूप से भूमिगत चट्टानों या गहरे समुद्र में दफन करना उन अणुओं को सहस्राब्दियों तक सुलभ चक्र से हटा देता है जिससे सतही कार्बन पूल धीरे-धीरे घटता है जिस पर कृषि और उद्योग दोनों निर्भर हैं। एक अधिक परिपक्व और कम अपशिष्ट प्रणाली तक पहुंचने के लिए कार्बन को चक्र में बनाए रखना चाहिए और जीवन के अंत में पुनर्प्राप्त किया जाना चाहिए। दफन केवल अंतिम उपाय होना चाहिए।क्रडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common