आईसीएमआर ने निपाह वायरस के खिलाफ स्वदेशी एंटीबॉडी विकसित करने को उद्योग भागीदारों से सहयोग मांगा

नयी दिल्ली, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने निपाह वायरस संक्रमण के उपचार के लिए स्वदेशी रूप से विकसित ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ का पशुओं पर सफल परीक्षण किया है और अब इनके विकास के लिए भारतीय उद्योग भागीदारों से सहयोग मांगा है ताकि महामारी की स्थिति में इसकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।

‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ प्रयोगशाला में निर्मित प्रोटीन होते हैं जो बाह्य पदार्थों और हानिकारक रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा उत्पादित ‘एंटीबॉडी’ की नकल करते हैं।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी अभिरुचि पत्र (ईओआई) के अनुसार निपाह वायरस (एनआईवी) भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘जूनोटिक (जानवरों से इंसान में फैलने वाले)’ खतरों में से एक के रूप में उभरा है तथा 2001 से इसका बार-बार प्रकोप सामने आया है। निपाह वायरस के संक्रमण में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है।

शीर्ष स्वास्थ्य अनुसंधान निकाय ने यह कहते हुए एक अभिरुचि पत्र जारी किया है कि आईसीएमआर निपाह वायरस रोग के विरुद्ध मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के विकास और निर्माण के लिए पात्र संगठनों कंपनियों और विनिर्माताओं के साथ सहयोग करने को तैयार है।

वैश्विक स्तर पर अनुसंधान और विकास के प्रयास आगे बढ़ रहे हैं लेकिन अभी तक कोई लाइसेंसप्राप्त टीका या विषाणु रोधी दवा उपलब्ध नहीं है।

आईसीएमआर के दस्तावेज के अनुसार कई टीकों पर अनुसंधान कार्य हो रहा है जिनमें सीईपीआई द्वारा समर्थित टीके भी शामिल हैं। इनमें से एक टीका मध्य-चरण के मानव परीक्षणों तक पहुंच गया है जिसमें भारत को एक प्रमुख केंद्र के रूप में पहचाना गया है। इसी प्रकार अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में टीकों के विकास के लिए अनुसंधान जारी है।

इसमें कहा गया है ‘‘हालांकि लाइसेंस मिलने में अभी कई साल लगेंगे। चिकित्सीय मोर्चे पर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (एमएबी) सबसे आशाजनक विकल्प के रूप में उभरी हैं।’’

क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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