नयी दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आज वित्तीय प्रणाली की मजबूती भविष्य के खतरों से सुरक्षा की गारंटी नहीं मानी जा सकती। उन्होंने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार सतर्क रहने पर जोर दिया। उन्होंने कहा पिछले दो दशकों का हमारा अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक सिखाता है- बैंकिंग क्षेत्र पर दबाव तेजी से बन सकता है और इसे सुलझाने में वर्षों लग जाते हैं। वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत के अत्यधिक कर्ज और एनपीए की विरासत को साफ करने में लगभग एक दशक लग गया। हम बेपरवाह होने का जोखिम नहीं उठा सकते कमजोरियों को पनपने देने की आर्थिक और वित्तीय कीमत बहुत ज्यादा होती है। आरबीआई गवर्नर ने यहां कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए नीति निर्माताओं के लिए प्रमुख प्राथमिकताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वित्तीय स्थिरता का लक्ष्य झटकों को रोकने पर नहीं बल्कि वित्तीय प्रणाली को इस तरह मजबूत बनाने पर होना चाहिए कि वह इनके असर को झेल सके और उन्हें सीमित रख सके।
मल्होत्रा ने बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के मजबूत बही-खातों के दम पर टिकी वित्तीय प्रणाली की मजबूती का जिक्र करते हुए कहा आज की मजबूती का मतलब कल की सुरक्षा नहीं हो सकता। हम आने वाली कमजोरियों को लेकर सतर्क रहने और अपनी वित्तीय प्रणाली को मजबूत बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
उन्होंने कहा कि आंतरिक या बाहरी वित्तीय झटकों को रोका नहीं जा सकता। ऐसे में हमारा मकसद एक ऐसी वित्तीय प्रणाली तैयार करना होना चाहिए जो भारी दबाव के बीच भी सेवाएं देने में सक्षम हो।
मल्होत्रा ने नई तरह के व्यवस्थागत जोखिमों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि अगला वित्तीय संकट जरूरी नहीं कि किसी बैंक या वित्तीय क्षेत्र के भीतर से ही शुरू हो बल्कि यह किसी वैश्विक घटना साइबर हमले या तकनीकी विफलता से पैदा हो सकता है और कई रास्तों से वित्तीय प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने नेटवर्क पर निर्भरता और संकट के एक जगह से दूसरी जगह फैलने के रास्तों को बेहतर ढंग से समझने की जरूरत पर जोर दिया। आरबीआई गवर्नर ने बेहतर और बारीक आंकड़ों के जरिए निगरानी तथा आकलन व्यवस्था में सुधार की वकालत भी की।
मल्होत्रा ने कहा कि मजबूती पूरे तंत्र के स्तर पर होनी चाहिए। उन्होंने साफ किया कि एक मजबूत बैंकिंग प्रणाली जरूरी तो है लेकिन अकेले यही काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि मजबूती केवल बैंकों में ही नहीं बल्कि गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों वित्तीय बाजारों भुगतान प्रणालियों प्रौद्योगिकी रूपरेखा प्रदाताओं महत्वपूर्ण तीसरे पक्षों और सीमा-पार वित्तीय नेटवर्कों में भी होनी चाहिए।
मल्होत्रा ने मजबूत संस्थानों निपटान की निश्चितता मुद्रा की एकरूपता और वित्तीय शुचिता को ऐसे बुनियादी गुण बताया जिन्हें हर हाल में बचाए रखने की जरूरत है।
आरबीआई गवर्नर ने कहा हमारे सामने चुनौती एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाने की है जो उन झटकों को भी झेल सके जिनका हम अंदाजा लगा सकते हैं और उन झटकों को भी जिनका हम अभी अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। मल्होत्रा ने कहा कि इसके लिए मजबूत संस्थान बेहतर आंकड़े शक्तिशाली वित्तीय बाजार भरोसेमंद सुरक्षा चक्र प्रभावी समाधान तंत्र और ऐसा नियमन तथा पर्यवेक्षण चाहिए जो सक्रिय दूरदर्शी और संतुलित हो।
उन्होंने बढ़ते वैश्विक कर्ज एआई से जुड़ी संपत्तियों के बढ़े हुए मूल्यांकन अत्यधिक कर्ज निजी ऋण और साइबर जोखिमों को वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए प्रमुख खतरों के रूप में गिनाया।
मल्होत्रा ने कहा कि वित्तीय नियामक वैश्विक घटनाओं जिंसों की कीमतों या प्रौद्योगिकी से पैदा होने वाले हर झटके को रोक नहीं सकते लेकिन यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वित्तीय प्रणाली शॉक एब्जॉर्बर के रूप में काम करे।
उन्होंने कहा कि कर्ज में वृद्धि एक बड़ी चिंता है क्योंकि बढ़ता कर्ज-जीडीपी अनुपात कम अवधि की परिपक्वता और सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी वित्तीय गुंजाइश को सीमित कर सकती है तथा कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल सकती है।
मल्होत्रा ने आगाह किया कि एआई निवेश या कमाई चक्र में सुस्ती आने से एआई से संबंधित संपत्तियों की कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है। बढ़ता कर्ज बाजार में गिरावट और वित्तीय अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
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