संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि बढ़ते विभाजन और संघर्ष के मौजूदा दौर में महात्मा गांधी की शिक्षाएं हमें नए सिरे से सचेत करती हैं। गुतारेस ने साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहानुभूति की उस भावना को आत्मसात करने का आह्वान किया जिसकी पैरवी महात्मा गांधी करते थे।
गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर को हर वर्ष मनाए जाने वाले ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के अवसर पर जारी अपने संदेश में गुतारेस ने कहा “इस अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर हम महात्मा गांधी के असाधारण जीवन और विरासत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।”
उन्होंने कहा कि गांधी ने अपने पूरे जीवन में शांति के सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए गहरे और स्थायी बदलाव लाने का प्रेरणादायी उदाहरण पेश किया।
गुतारेस के मुताबिक गांधी ने दिखाया कि अन्याय का मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका व्यवस्था में मौजूद भेदभाव और दमन की क्रूरता तथा हिंसा का उसी तरह जवाब देना नहीं है बल्कि संवाद और अहिंसा के माध्यम से आपसी समझ बनाना गरिमा सुनिश्चित करना और स्थायी बदलाव लाना है।
उन्होंने कहा “बढ़ते विभाजन तनाव और संघर्ष के इस दौर में गांधी की शिक्षाएं हमें नए सिरे से सचेत करती हैं।’’
संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने कहा ‘‘ लोग पीड़ित हैं गरीबी और असमानता ने संपन्न और वंचित लोगों के बीच खाई बढ़ा दी है। शांति और विकास की बुनियाद-संयुक्त राष्ट्र चार्टर मानवाधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून कूटनीति और संवाद को नजरअंदाज किया जा रहा है और उनका खुले तौर पर उल्लंघन किया जा रहा है।’’
उन्होंने कहा ‘‘ इस बेहद तनावपूर्ण समय में आइए गांधी के जीवन में दिखाई देने वाले साहस सहानुभूति गरिमा और साझा मानवता को अपनाएं। वास्तविक संवाद और कूटनीति के माध्यम से विभाजन को दूर करने पीड़ा समाप्त करने और अहिंसा के जरिए शांतिपूर्ण विश्व बनाने के लिए काम करें।’’
इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने ‘शांति और विकास के साधन के रूप में अहिंसा’ विषय पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने कहा कि सर्वोदय की अवधारणा के माध्यम से व्यक्त गांधी की विकास दृष्टि आज दुनिया में समावेशी समानतापूर्ण और सतत विकास की मौजूदा जरूरत को पूरा करती है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण के प्रति गांधी की सजगता उनकी इस बात में दिखाई देती है कि पृथ्वी हर व्यक्ति की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है लेकिन हर व्यक्ति के लालच को पूरा करने के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि यह विचार आज जलवायु संबंधी चिंताओं के बीच काफी प्रासंगिक है और सतत जीवनशैली तथा पृथ्वी के प्रति जिम्मेदार संरक्षण का आह्वान करता है। क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common