ईरान अमेरिका इजराइल गतिरोध लंबा खिंचने के आसार

सिडनी 21 अप्रैल (द कन्वरसेशन) अमेरिका- इजराइल और ईरान के बीच नाजुक युद्धविराम और मूल विवादों पर सीमित प्रगति के बीच इस संघर्ष के व्यापक शांति समझौते के साथ थमने के बजाय लंबा खिंचने के आसार नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि यह युद्ध ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ की दिशा में बढ़ रहा है।

‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ ऐसी स्थिति होती है जिसमें युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त नहीं होता लेकिन पूर्ण पैमाने की लड़ाई के बजाय छोटे स्तर पर ही सही यह जारी रहता है। 2014 से 2022 तक पूर्वी यूक्रेन में चला संघर्ष इसका प्रमुख उदाहरण रहा जहां हजारों लोगों की मौत हुई और लगातार साइबर तथा सूचना युद्ध के बाद स्थिति को ‘फ्रोजन’ माना गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सप्ताह पाकिस्तान में वार्ता फिर शुरू होती है और कोई समझौता भी हो जाता है तब भी इसके स्थायी समाधान में बदलने की संभावना कम है। इसके तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं।

विश्लेषकों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति में युद्धविराम को व्यापक राजनीतिक समाधान के बजाय अंतिम उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रही है।

उन्होंने कई संघर्षों के समाप्त होने का दावा किया है लेकिन इन मामलों में मूल मुद्दे अनसुलझे ही रहे और केवल अस्थायी शांति बनी रही।

ऐसी परिस्थितियों में तनाव जारी रहता है और संघर्ष ‘फ्रोजन’ स्थिति में पहुंच जाता है। उदाहरण के तौर पर भारत-पाकिस्तान और थाईलैंड-कंबोडिया के बीच हालिया तनावों में भी स्थायी समाधान नहीं निकल सका है।

वर्तमान संघर्ष में अमेरिका और इजराइल की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक है जिससे यह असममित युद्ध बन गया है। ईरान ने इसका जवाब पारंपरिक युद्ध के बजाय वैकल्पिक रणनीतियों से दिया है जैसे खाड़ी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना और वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना।

शोध से पता चलता है कि ऐसे युद्ध लंबे समय तक चलते हैं और अक्सर किसी स्थायी राजनीतिक समझौते के बजाय ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ में बदल जाते हैं। कमजोर पक्ष सीधे सैन्य जीत हासिल नहीं कर सकता इसलिए वह मजबूत पक्ष पर राजनीतिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर उसे थकाने की कोशिश करता है।

संघर्ष के केंद्र में मौजूद प्रमुख मुद्दों विशेषकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच अप्रैल में पाकिस्तान में प्रस्तावित वार्ता भी इस मुद्दे पर मतभेद के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन का अधिकार है जबकि अमेरिका इस पर कड़े प्रतिबंध चाहता है।

ईरान के साथ 2015 में हुआ संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) समझौता भी करीब 20 महीने की लंबी वार्ता के बाद संभव हो पाया था लेकिन ट्रंप ने बाद में इससे हटने का फैसला किया था। इस पृष्ठभूमि में त्वरित और स्पष्ट समाधान की संभावना कम मानी जा रही है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान किसी आंशिक समझौते की घोषणा कर सकते हैं जिसमें कई तकनीकी पहलुओं को बाद में सुलझाने के लिए छोड़ा जाएगा। हालांकि ईरान अपने परमाणु अधिकारों पर समझौता करने के मूड में नहीं दिखता और उसने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने की अपनी क्षमता भी प्रदर्शित की है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह संघर्ष कई युद्धविरामों के बावजूद लंबे समय तक ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ बना रह सकता है जिससे समय-समय पर हिंसा भड़कने और तनाव बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।

इसका असर इजराइल-ईरान अमेरिका-ईरान या दोनों के बीच टकराव के रूप में देखने को मिल सकता है। यह स्थिति गाजा पट्टी जैसे अन्य क्षेत्रों से मिलती-जुलती हो सकती है जहां युद्धविराम के बावजूद शासन व्यवस्था पुनर्निर्माण और हथियारबंदी जैसे मुद्दे अनसुलझे हैं और हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

इतिहास में कोरियाई प्रायद्वीप का उदाहरण भी उल्लेखनीय है जहां 1953 में युद्धविराम के बावजूद आज तक औपचारिक शांति समझौता नहीं हो पाया है और दोनों कोरिया तकनीकी रूप से अब भी युद्ध की स्थिति में हैं।

इसी तरह भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव ने दक्षिण एशिया में अस्थिरता और हथियारों की होड़ को जन्म दिया है।

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इजराइल और ईरान के बीच ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ की स्थिति मध्य पूर्व में दीर्घकालिक अस्थिरता संभावित हथियारों की दौड़ और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को लेकर बार-बार टकराव की नौबत ला सकती है।

क्रडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

%d bloggers like this: