उच्च न्यायालयों को अग्रिम,नियमित जमानत अर्जी दायर होने की तिथि से 2 माह के अंदर निर्णय का निर्देश

नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नियमित और अग्रिम जमानत अर्जियों के निपटारे में लंबे समय तक देरी न्याय से वंचित करने के समान है और उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया कि वे ऐसी अर्जियां दायर होने की तारीख से दो महीने के भीतर उनपर निर्णय करें।

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित अर्जियों को वर्षों तक लंबित नहीं रखा जा सकता जबकि अर्जी दायर करने वाला ‘‘अनिश्चितता की स्थिति’’ में हो।

शीर्ष अदालत ने कहा कि नियमित और अग्रिम जमानत अर्जियों पर पक्षकारों को अनिश्चितकाल तक इंतजार कराए बिना गुण-दोष के आधार पर शीघ्रता से निर्णय लिया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि निपटान में लंबी देरी न केवल दंड प्रक्रिया संहिता के उद्देश्य को विफल करती है बल्कि अनुच्छेद 14 और 21 में प्रतिबिंबित संवैधानिक मूल्यों के विपरीत न्याय से वंचित करने के समान है। शीर्ष अदालत ने कहा ‘‘उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके समक्ष या उनके अधिकार क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों के समक्ष लंबित जमानत और अग्रिम जमानत अर्जियों का शीघ्रता से दायर करने की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर निपटारा किया जाए सिवाय उन मामलों को छोड़कर जहां देरी स्वयं पक्षकारों के कारण हो।’’

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों से जिला अदालतों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने और अनिश्चितकालीन स्थगन से बचने के लिए आवश्यक प्रशासनिक निर्देश जारी करने को भी कहा। पीठ ने कहा ‘‘जांच एजेंसियों से अपेक्षा की जाती है कि वे लंबे समय से लंबित मामलों की जांच शीघ्रता से पूरी करें ताकि अनावश्यक देरी के कारण न तो शिकायतकर्ता और न ही आरोपी को कोई नुकसान हो।’’

पीठ ने कहा कि राज्यों के सर्वोच्च संवैधानिक मंच होने के नाते उच्च न्यायालयों को लंबित जमानत या अग्रिम ज़मानत अर्जियों की ढेर लगने देने से बचने के लिए उपयुक्त तंत्र और प्रक्रियाएं तैयार करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिकों की स्वतंत्रता को नुकसान न पहुंचे। पीठ ने कहा ‘‘विशेष रूप से जमानत और अग्रिम जमानत अर्जियों को बिना किसी भी तरह का आदेश पारित किए लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए क्योंकि इस तरह अर्जियों का लंबित रहना सीधे तौर पर स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करता है।

इस (उच्चतम) न्यायालय के रजिस्ट्रार (न्यायिक) इस फैसले की एक प्रति सभी उच्च न्यायालयों को तत्काल अनुपालन और त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई के लिए भेजें।’’ यह फैसला धोखाधड़ी और जालसाजी के एक मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज करने के मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील पर आया।

शीर्ष अदालत ने अग्रिम जमानत के अलावा एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी गौर किया जो अपीलकर्ताओं की अग्रिम जमानत की अर्जी के निपटारे में उच्च न्यायालय द्वारा की गई देरी से संबंधित था।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडियाफोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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