सिडनी, ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक प्रसारक एबीसी ने समाचार तैयार करने में सृजनात्मक कृत्रिम मेधा (जेनरेटिव एआई) के इस्तेमाल को लेकर मंगलवार को अपने रुख में बदलाव के संकेत दिए। पहले जहां वह इस तकनीक को लेकर सतर्कता बरत रहा था वहीं अब अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी एंथ्रोपिक के साथ हुए हालिया समझौते के बाद एबीसी के कर्मचारियों के लिए समाचार जारी करने में ‘क्लॉड एआई’ का उपयोग करने का रास्ता खुल गया है।
फिलहाल एआई के इस्तेमाल का दायरा सीमित रखा गया है और इसका मुख्य उद्देश्य रेडियो कार्यक्रमों को समाचार लेखों में बदलना है। हालांकि एबीसी ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में इसका दायरा बढ़ाकर अन्य कार्यों में भी एआई का उपयोग किया जा सकता है। प्रसारक एआई अपनाने की प्रक्रिया में सहायता के लिए विशेषज्ञों की भी नियुक्ति करेगा।
इस पहल का उद्देश्य कर्मचारियों को नियमित कार्यों से राहत देकर उन्हें खोजी पत्रकारिता जैसे मूल कार्यों के लिए अधिक समय उपलब्ध कराना है। साथ ही इससे एबीसी की समाचार गुणवत्ता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
ऑस्ट्रेलिया में एआई टूल को लेकर लोगों के बीच एक अलग तरह का अविश्वास है। ऐसे में यह देखना होगा कि आम जनता इस बदलाव को किस तरह स्वीकार करती है। दूसरी ओर यह फैसला उस लंबे इतिहास के अनुरूप भी है जिसमें संपादक और पत्रकार नयी तकनीकों को सबसे पहले अपनाने वालों में शामिल रहे हैं।
पत्रकार पहले से ही विभिन्न डेटा टूल का इस्तेमाल करते हैं। वहीं जेनरेटिव एआई का उपयोग पत्रकारिता को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ऐसे नए और अभूतपूर्व तरीकों से भी किया जा सकता है जो अबतक संभव नहीं थे।
हालांकि यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब पत्रकारिता पहले से ही समाचार संस्थानों और पत्रकारों के अस्तित्व से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। एआई इन समस्याओं को दूर भी कर सकता है तथा उतनी ही आसानी से उन्हें और गंभीर भी बना सकता है।
पत्रकार और समाचार निर्माता लंबे समय से ऐसे प्रौद्योगिकी नवाचारों में विशेष रुचि रखते रहे हैं जो उनकी व्यस्त कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बना सकें। साथ ही अत्याधुनिक टूल और नयी प्रौद्योगिकियों को जानने-समझने के प्रति उनमें हमेशा गहरी जिज्ञासा भी रही है।
चैटबॉट के रूप में जेनरेटिव एआई ने पिछले केवल तीन वर्षों में ही सुर्खियां बटोरी हैं लेकिन पत्रकार एक दशक से भी अधिक समय से स्वचालित प्रणालियों और ‘रोबो-राइटिंग’ का उपयोग कर आंकड़ों को सरल समाचारों में बदलकर अपने काम को आसान बनाते रहे हैं। वर्ष 2016 के एक अध्ययन में तो पाठकों ने कंप्यूटर द्वारा तैयार लेखों को ‘‘अधिक विश्वसनीय’’ और ‘‘पत्रकारिता की दृष्टि से अधिक विशेषज्ञता वाला’’ माना था।
हालांकि प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाने के साथ यह चिंता भी बढ़ी है कि कुछ नवाचार लाभ पहुंचाने के बजाय अधिक व्यवधान पैदा कर सकते हैं।
मसलन सोशल मीडिया और डेटा विश्लेषण ने एल्गोरिद्म को पत्रकारों पर हावी एक ऐसे अतिरिक्त ‘संपादक’ के रूप में खड़ा कर दिया जिसकी दखलअंदाजी ने उनकी संपादकीय स्वायत्तता को कमजोर कर दिया।
अब जेनरेटिव एआई एक नया खतरा लेकर आया है जिसने समाचार माध्यमों के अस्तित्व को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
जेनरेटिव एआई को लेकर पत्रकारों की चिंता पहले इस्तेमाल किए गए अन्य स्वचालित टूल की तुलना में कहीं अधिक है क्योंकि चैटबॉट अब ऐसी सामग्री तैयार कर सकते हैं जो मानवीय लेखन जैसी प्रतीत होती है। इसी कारण पत्रकार लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि समाचारों को परखकर जनता तक पहुंचाने वाले ‘द्वारपाल’ (गेटकीपर) के रूप में उनकी भूमिका अपरिहार्य है।
ऐसे में यदि समाचार संस्थान पत्रकारिता में एआई का सहारा लेते हैं तो सबसे अहम सवाल यह होगा कि नैतिकता और गुणवत्ता से जुड़े मुद्दों का समाधान कैसे किया जाए। कानून से लेकर चिकित्सा तक कई क्षेत्रों के व्यस्त पेशेवरों को तब भारी नुकसान उठाना पड़ा जब उनके जेनरेटिव एआई ने अपेक्षित दायरे से हटकर देखने में विश्वसनीय लेकिन पूरी तरह काल्पनिक जानकारी तैयार कर दी।
यह स्थिति पत्रकारों के लिए और भी बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में पत्रकारिता पहले ही जनता के घटते विश्वास की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे में सामग्री तैयार करने के लिए एआई पर निर्भरता उन गलतियों की आशंका बढ़ा देती है जिनकी कीमत एबीसी जैसे समाचार संस्थान नहीं चुका सकते।
हालांकि यदि समाचार कक्ष (न्यूजरूम) एआई से तैयार सामग्री के सत्यापन संपादन और सावधानीपूर्वक चयन पर अतिरिक्त ध्यान दें तो इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे समाचारों के ‘द्वारपाल’ के रूप में पत्रकारों की भूमिका पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन इसके लिए यह भी आवश्यक है कि दर्शकों और पाठकों का पत्रकारों पर भरोसा बना रहे तथा वे उनके विवेक विश्लेषण और निर्णय क्षमता को महत्व दें।
ये बदलाव पत्रकारिता में एक नए प्रकार के कार्य को जन्म दे रहे हैं जो लंबे समय से पत्रकारिता के केंद्र में रही पारंपरिक समाचार-निर्माण प्रक्रिया से ध्यान हटाकर सत्यापन चयन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने जैसे कार्यों पर अधिक केंद्रित है। दूसरी ओर एआई के नए टूल पत्रकारों को अपने काम को अधिक प्रभावी बनाने के नए अवसर भी उपलब्ध कराते हैं। जिन बड़े भाषा मॉडल और अन्य एआई टूल का इस्तेमाल आम लोग कार्यालयी ई-मेल लिखने या मनोरंजक तस्वीरें तैयार करने के लिए करते हैं उन्हीं का उपयोग दुनिया भर के पत्रकार अभूतपूर्व खोजी रिपोर्टिंग और समाचार निर्माण में भी कर रहे हैं।
पत्रकारिता में एआई से मिलने वाली दक्षता और कार्यक्षमता में वृद्धि वास्तविक है। दिलचस्प बात यह है कि लोग स्वयं एआई प्रौद्योगिकी पर पूरी तरह भरोसा न करने के बावजूद उससे तैयार परिणामों की उपयोगिता को स्वीकार कर सकते हैं।
क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common