बेंगलुरु, कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकाओं की संख्या बढ़कर 226 हो गई है। बुधवार को इस सूची में नौ और तालुकाओं को शामिल किया गया। राज्य के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र से सूखा राहत मांगने के लिए अंतिम ज्ञापन तैयार कर रही है।
राजस्व विभाग का भी प्रभार संभाल रहे परमेश्वर ने यहां संवाददाताओं से कहा कि राज्य में सूखे से हुए नुकसान का ब्योरा देने वाला अंतिम ज्ञापन एक सप्ताह के भीतर तैयार होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा ‘‘नए चिह्नित नौ तालुकाओं में जमीनी स्तर पर सत्यापन पूरा हो गया है जबकि कुछ अन्य तालुकाओं में ‘ट्रिगर-एक’ मानदंड के तहत आकलन जारी है। जो तालुक इन मानदंडों पर खरे उतरेंगे उनमें भी जमीनी स्तर पर सत्यापन किया जाएगा।’’ उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आपदा मोचन कोष (एनडीआरएफ) के दिशानिर्देशों के अनुसार अंतिम ज्ञापन तैयार होने के बाद कुल अनुमानित नुकसान और केंद्र से मांगी जाने वाली राहत राशि तय की जाएगी।
परमेश्वर ने कहा ‘‘पिछले साल हमने सूखा राहत के तौर पर करीब 18 000 करोड़ रुपये मांगे थे। इस साल लगभग पूरे राज्य में नुकसान हुआ है और अब तक 226 तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। यदि और तालुक इन मानदंडों पर खरे उतरते हैं तो नुकसान का आंकड़ा और बढ़ जाएगा।’’ उन्होंने बताया कि उन्होंने और मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने केंद्र से सूखा राहत के लिए एनडीआरएफ के मानदंडों में ढील देने का आग्रह किया था।
परमेश्वर ने कहा कि केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस अनुरोध पर विचार करने का आश्वासन दिया था लेकिन राज्य को अब तक इस संबंध में कोई और जवाब नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि अंतिम ज्ञापन तैयार होने के बाद सरकार मुख्यमंत्री उपमुख्यमंत्री और अन्य लोगों के प्रतिनिधिमंडल को दिल्ली भेजने पर फैसला करेगी ताकि ज्ञापन केंद्र को सौंपकर उचित राहत मांगी जा सके। एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर उपमुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य मंत्रिमंडल की बैठक बृहस्पतिवार को होगी जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण से जुड़े उच्च न्यायालय के फैसले पर चर्चा की जाएगी।
उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल यह तय करेगा कि सरकार इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे या आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कराने का अनुरोध करे। परमेश्वर ने कहा कि मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोमवार को वर्ष 2022 के राज्य कानून के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया था जिनके तहत अनुसूचित जातियों (एससी) का आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) का आरक्षण तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत किया गया था। अदालत ने कहा था कि बढ़ा हुआ आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करता है।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common