चेन्नई, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने दशकों पुराने कावेरी नदी जल बंटवारा विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान तलाशने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के साथ द्विपक्षीय वार्ता का प्रस्ताव रखा है। हालांकि उनके इस कदम की राज्य के किसान संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने तीखी आलोचना की है। मुख्यमंत्री विजय कावेरी जल विवाद पर चर्चा के लिए तीन अगस्त को बेंगलुरु जाएंगे। इस संबंध में उन्होंने शिवकुमार को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था जिस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने सहमति दे दी है।
सूत्रों के अनुसार 1970 और 1980 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन ने कर्नाटक के साथ सीधे संवाद का रास्ता अपनाया था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत संबंधों और राजनीतिक सद्भाव के बल पर न्यायिक प्रक्रिया से इतर तत्काल पानी छोड़े जाने पर सहमति कायम कराई थी। सूत्रों का कहना है कि राजनीतिक परंपराओं से हटकर किए गए उनके अचानक कर्नाटक दौरे भी तमिलनाडु के हित में कारगर साबित हुए और राज्य को समय पर कावेरी का पानी मिल सका।
इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए तमिलनाडु के कृषि मंत्री आर. विनोद ने शुक्रवार को संवाददाताओं से कहा कि मुख्यमंत्री विजय लंबित कावेरी जल विवाद और प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना पर द्विपक्षीय वार्ता के लिए तीन अगस्त को बेंगलुरु जाएंगे। कुंभकोणम में उन्होंने कहा ‘‘कर्नाटक सरकार ने मुख्यमंत्री विजय को राज्य के दौरे के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा है।’’ मेकेदातु बांध परियोजना पर तमिलनाडु के कड़े रुख को दोहराते हुए राज्य के कृषि मंत्री ने कहा ‘‘हम शुरू से ही इस परियोजना का विरोध करते आए हैं। हम किसी भी कीमत पर इसका क्रियान्वयन नहीं होने देंगे।’’
यह निमंत्रण कर्नाटक की हालिया पहल के बाद आया है। 18 जून को डी. के. शिवकुमार ने राजनीति से परे मेकेदातु मुद्दे पर किसी भी समय मुख्यमंत्री विजय से चर्चा करने की इच्छा जताई थी। इसके बाद 20 जून को कर्नाटक के मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने भी कहा था कि यदि तमिलनाडु तैयार हो तो उनका राज्य द्विपक्षीय वार्ता के लिए तैयार है। कई वर्षों बाद यह पहला अवसर होगा जब तमिलनाडु का कोई मुख्यमंत्री कावेरी मुद्दे पर द्विपक्षीय वार्ता के लिए कर्नाटक जाएगा। इससे पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन में होने के बावजूद तत्कालीन द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार यह मानती रही थी कि कर्नाटक के साथ सीधी वार्ता से कोई ठोस परिणाम नहीं निकलेगा और इस विवाद का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।
इस बीच पी. आर. पांड्यन के नेतृत्व वाले तमिलनाडु कावेरी किसान संघ ने इस पहल का विरोध किया है। संगठन का कहना है कि वैधानिक व्यवस्था से बाहर होने वाली कोई भी वार्ता उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी तंत्र को कमजोर करेगी। संगठन ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वह कर्नाटक से 77 87 करोड़ लीटर पानी दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं। यह मांग पहले द्रमुक अध्यक्ष एम. के. स्टालिन भी उठा चुके हैं। पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) नेता अंबुमणि रामदास ने भी मेकेदाटू बांध परियोजना पर कर्नाटक के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत का विरोध किया है। उच्चतम न्यायालय ने 2018 के अपने फैसले में दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को विनियमित और लागू करने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) का गठन किया था।
उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुसार एक जून से 22 जुलाई 2026 के बीच तमिलनाडु को 87 782 करोड़ लीटर पानी मिलना था लेकिन उसे केवल 9 910 करोड़ लीटर पानी मिला।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common