‘ड्रीम जॉब’ का मिथक: कहीं करियर की दौड़ में जिंदगी तो पीछे नहीं छूट रही?

एडमंटन, किसी न किसी मोड़ पर हममें से ज्यादातर लोगों ने काम को लेकर यह सलाह जरूर सुनी होगी कि ‘‘ऐसा काम चुनो जिसे करने में आपको खुशी मिले फिर वह आपको जिंदगी में कभी बोझ या मजबूरी नहीं लगेगा और काम करना भी आपको काम जैसा महसूस नहीं होगा।’’ ‘ड्रीम जॉब’ यानी ऐसी नौकरी का विचार जिसे हम अपने सपनों के अनुरूप मानते हैं सुनने में बेहद आकर्षक और प्रेरणादायक लगता है। इससे यह उम्मीद पैदा होती है कि नौकरी सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं बल्कि जीवन में उद्देश्य अपनी पहचान और व्यक्तिगत संतुष्टि पाने का भी जरिया हो सकती है। लेकिन एक नौकरी से इन सभी उम्मीदों को जोड़ देना खासकर करियर की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए दबाव का कारण बन सकता है।

अगर आपका करियर आपको किसी ‘जुनून’ जैसा महसूस नहीं होता या समय के साथ आपकी रुचियां बदल जाती हैं और आपका काम आपको पहले जैसा उपयुक्त नहीं लगता तो ऐसा लग सकता है कि कहीं न कहीं आप ही असफल हो गए हैं। लेकिन करियर और काम को लेकर प्रेरणा पर हुए शोध एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। हो सकता है समस्या यह न हो कि हम अपने काम में उद्देश्य तलाशने में नाकाम हो रहे हैं बल्कि यह हो कि हमें शुरू से यह उम्मीद करना सिखाया गया है कि एक ही नौकरी हमें सब कुछ देगी—जीवन का उद्देश्य पहचान आर्थिक सुरक्षा और व्यक्तिगत संतुष्टि।

अर्थपूर्ण काम निश्चित रूप से संतुष्ट जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। लेकिन हर हाल में एक ‘ड्रीम जॉब’ हासिल करने की कोशिश हमें थकान आर्थिक दबाव और पहचान की अस्थिरता की ओर भी ले जा सकती है। इससे ज्यादा टिकाऊ नजरिया यह है कि काम को संतुष्ट और सार्थक जीवन का एक हिस्सा माना जाए पूरी जिंदगी नहीं। जब अपने काम से प्यार की कीमत चुकानी पड़े : ‘ड्रीम जॉब’ की धारणा से जुड़ी एक समस्या यह है कि जुनून कभी-कभी कार्यस्थल पर कुछ मुश्किल समझौते भी करवाने लगता है।

मनोवैज्ञानिक एरॉन के और उनके सहयोगियों के शोध से पता चलता है कि लोग जुनूनी होकर काम करने वाले कर्मचारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां डालना अधिक स्वीकार्य मान सकते हैं। इनमें बिना पारिश्रमिक के काम करना नौकरी के तय दायरे से बाहर के काम करना और अपने निजी कामों के लिए रखे गए समय का त्याग करना भी शामिल है। इसकी वजह यह धारणा हो सकती है कि जिस काम के प्रति व्यक्ति इतना जुनूनी है वही काम उसे किसी तरह का अतिरिक्त पुरस्कार भी दे रहा है। यह स्थिति उन क्षेत्रों में खास तौर पर प्रासंगिक हो सकती है जिन्हें अक्सर जुनून से जोड़कर देखा जाता है जैसे मीडिया फैशन मनोरंजन और कला। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अक्सर अपने काम को अपनी व्यक्तिगत पहचान और रचनात्मक संतुष्टि से गहराई से जुड़ा हुआ बताते हैं। जुनून काम करने की प्रेरणा और संतुष्टि का स्रोत हो सकता है। लेकिन जब काम को जीवन का उद्देश्य मान लिया जाता है तो काम और निजी जीवन की सीमाएं धुंधली होना और अवास्तविक अपेक्षाओं को सही ठहराना आसान हो सकता है।

दूसरी चुनौती मनोवैज्ञानिक है। 22 साल की उम्र में जो व्यक्ति आप हैं जरूरी नहीं कि 32 या 42 की उम्र में भी वही रहें। करियर विकास पर शोध करने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से मानते आए हैं कि पेशे से जुड़ी पहचान कोई स्थिर चीज नहीं है। यह समय के साथ बदलती रहती है क्योंकि लोगों की रुचियां मूल्य और जीवन की परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं। लेकिन जब हम अपनी पहचान का एक बड़ा हिस्सा किसी एक पेशे से जोड़ लेते हैं तो करियर बदलना मुश्किल हो सकता है। करियर पहचान पर हुए शोध बताते हैं कि खुद को लेकर लचीला नजरिया रखने से लोगों को बदलाव के दौर से गुजरने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा बर्नआउट यानी काम से होने वाली मानसिक और शारीरिक थकान का खतरा भी रहता है। जब कोई व्यक्ति अपने शौक या पसंद के काम को ही अपना पेशा बना लेता है तो वही काम जो पहले उसे खुशी देता था और तनाव कम करने में मदद करता था धीरे-धीरे जिम्मेदारियों और दबाव का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में जिस काम से कभी सुकून मिलता था वही काम तनाव का कारण बनने लग सकता है। जब काम ही आपका जुनून हो तो काम का कोई खराब दिन भी व्यक्तिगत असफलता जैसा लग सकता है।

शोध से यह भी संकेत मिलता है कि कई कर्मचारी अब करियर की सफलता की उस पारंपरिक धारणा पर दोबारा विचार कर रहे हैं जिसके मुताबिक सफलता का मतलब है एक ऐसा उपयुक्त पेशा खोज लेना जिसे जीवनभर किया जा सके। यह बदलाव खास तौर पर ‘जेन-जी’ (आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों) में दिखाई देता है जो अब बड़ी संख्या में कार्यबल का हिस्सा बन रही है। युवा कर्मचारियों को कभी-कभी ‘आलसी’ या ‘गैर-जिम्मेदार’ कहकर उनकी आलोचना की जाती है लेकिन संभव है कि वे दरअसल इस पुरानी धारणा पर सवाल उठा रहे हों कि एक सफल करियर से आखिर क्या-क्या हासिल होना चाहिए। वर्ष 2025 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि जेन-जी और ‘मिलेनियल्स’ के लिए आर्थिक स्थिरता और कामकाजी जीवन के बीच संतुलन सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

मिलेनियल्स उस पीढ़ी को कहा जाता है जिनका जन्म आम तौर पर 1981 से 1996 के बीच माना जाता है। ऐसा करियर बनाएं जो बदलते समय के साथ बदल सके : अगर ‘ड्रीम जॉब’ की तलाश हमें सीमित कर रही है तो उसकी जगह क्या अपनाया जाए एक विकल्प यह है कि ‘परफेक्ट’ नौकरी खोजने पर कम और ऐसी कौशल क्षमताएं तैयार करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाए जिसे अलग-अलग कामों में इस्तेमाल किया जा सके।

मसलन अपनी पहचान को सिर्फ ‘मार्केटिंग डायरेक्टर’ होने से जोड़ने के बजाय आप प्रभावी लेखन डेटा विश्लेषण और परियोजना प्रबंधन जैसे कई कौशलों में महारत हासिल करने का लक्ष्य रख सकते हैं। कौशलों का ऐसा संग्रह आपको बदलती परिस्थितियों के साथ ढलने की क्षमता देता है। आपकी रुचियां बदलें तो आप अलग-अलग उद्योगों और भूमिकाओं में इन्हीं कौशलों का इस्तेमाल कर सकते हैं। यानी करियर की दिशा बदलने के लिए आपको हर बार शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी।

संतुष्ट जीवन के लिए काम ही सब कुछ नहीं : ‘ड्रीम जॉब’ को पाने की लगातार कोशिश ही सफल करियर का एकमात्र रास्ता नहीं है। ऐसी दुनिया में जहां काम का स्वरूप पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बदल रहा है सबसे टिकाऊ और संतुष्टिदायक करियर वही हो सकता है जो बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढाल सके।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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