नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केरल के कानूनों के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जिसमें कराधान अधिकारी के समक्ष वाहन कर के भुगतान के समय परिवहन वाहन मालिकों द्वारा कल्याण निधि योगदान के प्रेषण की रसीद पेश करने की अनिवार्यता का प्रावधान शामिल है।
न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की पीठ ने कहा कि केरल मोटर वाहन कराधान (संशोधन) अधिनियम के दो प्रावधान और परिवहन कर्मचारियों के कल्याण के लिए धन के संग्रह से संबंधित केरल मोटर परिवहन श्रमिक कल्याण कोष अधिनियम 2005 की एक धारा 1988 के केंद्रीय कानून, मोटर वाहन अधिनियम के ‘प्रतिकूल’ नहीं है, और इसलिए संवैधानिक रूप से मान्य है।
पीठ ने कहा, ‘यह समझ से परे है कि वाहन मालिक / परमिट-धारक यह तर्क कैसे दे सकता है कि वह 1985 के अधिनियम के तहत बकाया का भुगतान नहीं करेगा और फिर भी, श्रमिकों का शोषण करके केरल राज्य में हमेशा की तरह मोटर परिवहन के व्यवसाय जारी रखेगा।’
फैसला राज्य के दो कानूनों के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखने वाले उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ ऑल केरल डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन, कोट्टायम द्वारा दायर एक अपील सहित विभिन्न अपीलों पर सुनाया गया है।
क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
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