न्यायालय ने 2500 से अधिक बी.एड सीट की मंजूरी न देने के उत्तराखंड सरकार के फैसले को बरकरार रखा

नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने बी.एड पाठ्यक्रम संचालित करने वाले महाविद्यालयों को मान्यता न देने को लेकर उत्तराखंड सरकार के 2013 के फैसले को बृहस्पतिवार को इस आधार पर बरकरार रखा कि वार्षिक स्तर पर सिर्फ 2500 शिक्षकों की जरूरत है, जबकि 13,000 छात्र पास कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने दलील दी कि उसके द्वारा 16 जुलाई, 2013 के अपने पत्राचार में इस तथ्य पर विचार करते हुए एक सुविचारित नीति निर्णय लिया गया था कि प्रति वर्ष 2500 शिक्षकों की आवश्यकता है, जबकि लगभग 13000 छात्र बी.एड पाठ्यक्रम पास कर रहे होंगे, जिससे अंतत: बेरोजगारी बढ़ेगी, क्योंकि राज्य सरकार बी.एड पाठ्यक्रम पूरा करने वाले 2500 से अधिक उत्तीर्ण छात्रों को रोजगार देने की स्थिति में नहीं होगी।

न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें उसने राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की उत्तरी क्षेत्रीय समिति को 16 जुलाई, 2013 को भेजे गए पत्र को रद्द कर दिया था।

पीठ ने कहा, ‘‘ बताये गये कारणों के मद्देनजर वर्तमान अपील मंजूर की जाती है।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार के फैसले को मनमाना नहीं कहा जा सकता, जैसा कि उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है।

उत्तराखंड सरकार ने उस निजी कॉलेज के मामले में पारित उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिसे बी.एड पाठ्यक्रमों के लिए सीट बढ़ाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।

क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Wikimedia commons

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