‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 20 सितंबर को नई दिल्ली में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के “पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया।19 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन किए गए इस सम्मेलन में 17 देशों के कानूनविद्, न्यायाधीश, शिक्षाविद, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल हुए।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और एशियाई विकास बैंक के प्रतिनिधियों ने भी इसमें भाग लिया।समापन सत्र में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों तथा बिजली मंत्री मनोहर लाल, सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता शामिल हुए।सभा को संबोधित करते हुए मुर्मू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के कई पहलुओं में असंतुलन पैदा कर रहा है। जैव विविधता का नुकसान, पानी की कमी और भूमि का क्षरण जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़े हैं, जबकि इसके परिणाम खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आजीविका को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि हाल की प्राकृतिक आपदाओं ने जलवायु के प्रति मजबूत कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है।

जलवायु से जुड़े प्रभाव अधिक बार और अधिक तीव्रता से हो रहे हैं, जिसके लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर हितधारकों के बीच समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है।मुर्मू ने जलवायु परिवर्तन की जटिल और अनिश्चित प्रकृति से निपटने के लिए नीतियों और कार्यों के एक सुव्यवस्थित ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल सरकारें और कानूनी विशेषज्ञ इस चुनौती का समाधान नहीं कर सकते और पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तनों से सीधे प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि जलवायु नीतियां ग्रामीण और वन-निवासी समुदायों, छोटे किसानों, महिलाओं और अन्य कमजोर समूहों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक प्रभाव आमतौर पर उन्हीं पर पड़ता है।राष्ट्रपति ने जलवायु अनुकूलन को मजबूत करने में पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और स्थानीय समुदायों के व्यावहारिक अनुभवों के महत्व पर प्रकाश डाला। दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाके में अपने बचपन को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि उन्होंने आदिवासी समुदायों और प्रकृति के बीच के गहरे रिश्ते को खुद देखा है।उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिता खाना पकाने के लिए पास के जंगल से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करते थे और उन्हें काटने से पहले सम्मान के तौर पर उनके सामने झुकते थे।

उन्होंने कहा कि विनम्रता की यह भावना इंसानों और प्रकृति के बीच बुनियादी रिश्ते की सांस्कृतिक समझ को दिखाती है।मुर्मू ने उस वैदिक सिद्धांत का ज़िक्र किया जिसके अनुसार धरती से जो कुछ भी लिया जाए, उसे जल्द से जल्द वापस कर देना चाहिए या उसकी भरपाई करनी चाहिए। उन्होंने इसे टिकाऊ तरीके से संसाधन निकालने और पर्यावरण को फिर से ठीक करने का एक शुरुआती और सार्थक उदाहरण बताया।उन्होंने पारंपरिक ज्ञान पर आधारित, लोगों और समुदायों पर केंद्रित अनुकूलन रणनीतियों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

उन्होंने कहा कि जलवायु से निपटने के ज़्यादा असरदार तरीके बनाने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक क्षमताओं को स्थानीय समुदायों के तौर-तरीकों और अनुभवों के साथ मिलाया जाना चाहिए।मुर्मू ने कहा कि रिमोट सेंसिंग, बायोटेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, प्रेडिक्टिव मॉडलिंग और डिजिटल टूल्स जैसी तकनीकों को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इस तरह के तालमेल से जलवायु से जुड़ी समझ का एक नया दौर शुरू हो सकता है और सरकारों व समुदायों को ज़्यादा सटीक और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से सही उपाय करने में मदद मिल सकती है।

राष्ट्रपति ने जलवायु के प्रति मज़बूती (resilience) बढ़ाने में टिकाऊ तरीके से पेड़ लगाने की भूमिका पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मकसद सिर्फ़ पेड़ लगाना नहीं होना चाहिए, बल्कि स्थानीय पर्यावरण की स्थितियों के अनुकूल स्वस्थ, जैव-विविधता वाले और खुद-ब-खुद फलने-फूलने वाले इकोसिस्टम को फिर से बनाने पर ध्यान देना चाहिए।उन्होंने विकास को ही जलवायु अनुकूलन का एक अहम हिस्सा बताया।

उन्होंने कहा कि मज़बूत समाज बनाने के लिए बेहतर पब्लिक हेल्थ सिस्टम, जलवायु के प्रति मज़बूत इंफ्रास्ट्रक्चर, खेती की बेहतर उत्पादकता और सस्ती व भरोसेमंद ऊर्जा तक पहुँच ज़रूरी है।भारत के रूफटॉप सोलर प्रोग्राम का ज़िक्र करते हुए मुर्मू ने कहा कि रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) से जुड़ी पहल देश के ऊर्जा परिदृश्य को बदलने में मदद कर रही हैं। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को ऐसे रास्ते पर चलने की ज़रूरत है जो विकास की रफ़्तार से समझौता किए बिना मज़बूती (resilience) को बढ़ाए।

उन्होंने कहा कि जलवायु से जुड़े वादे देश की विकास संबंधी ज़रूरतों और आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप होने चाहिए और तकनीकी रूप से भी उन्हें पूरा करना संभव होना चाहिए।राष्ट्रपति ने पर्यावरण से जुड़े कामकाज और बड़ी संख्या में पर्यावरण संबंधी विवादों के तेज़ी से निपटारे में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भूमिका की तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल ने नदियों, हवा की गुणवत्ता और कचरा प्रबंधन से जुड़े मामलों में नियमों के पालन का एक असरदार सिस्टम बनाया है।मुर्मू ने पर्यावरण संरक्षण में नागरिकों, खासकर युवाओं को शामिल करने के भारत के प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि ‘मिशन LiFE’ ने दिखाया है कि कैसे लोगों की भागीदारी और समुदाय की हिस्सेदारी पर्यावरण को फिर से ठीक करने में सार्थक योगदान दे सकती है।उन्होंने भरोसा जताया कि इस सम्मेलन में होने वाली चर्चाएँ और एक्शन प्लान, समावेशी नीतियों और असरदार तरीके से लागू करने के आधार पर जलवायु के प्रति मज़बूत समाज बनाने की दिशा में मदद करेंगे। सत्र को संबोधित करते हुए मनोहर लाल ने कहा कि भारत तेज़ आर्थिक विकास और पर्यावरण की स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

उन्होंने कहा कि गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारीभारत की बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा इसी से आता है और देश ने समय से पांच साल पहले ही 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लिया है।उन्होंने टिकाऊ शहरी विकास, जल सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन, ग्रीन मोबिलिटी और इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़ी सरकारी पहलों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सामूहिक और रचनात्मक कार्रवाई जरूरी है।सुप्रीम कोर्ट की जज बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े कामकाज में विकास और संरक्षण, वर्तमान जरूरतों और भविष्य के हितों, तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचने से समुदायों और पीढ़ियों पर पड़ने वाले अलग-अलग प्रभावों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के प्रति सुप्रीम कोर्ट के इको-सेंट्रिक (पर्यावरण-केंद्रित) दृष्टिकोण की ओर इशारा किया और प्रभावी संस्थानों, लागू करने वाले तंत्रों, पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय तक पहुंच के महत्व पर जोर दिया।

नागरत्ना ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, प्रदूषण और पानी की कमी आपस में जुड़ी हुई चुनौतियां हैं, जिनसे निपटने के लिए अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों के बीच सहयोग, बेहतर जानकारी साझा करने और देशों के बीच जिम्मेदारियों के समान बंटवारे की जरूरत है।नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि सम्मेलन ने यह दिखाया है कि पर्यावरण संबंधी चुनौतियों की पहचान करने से आगे बढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकारों और संस्थानों को ऐसे कानून, साझेदारियां और संस्थागत तंत्र विकसित करने चाहिए जो इन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।उन्होंने कहा कि जलवायु कार्रवाई समावेशी और न्यायसंगत होनी चाहिए, जिसमें कमजोर समुदायों और आने वाली पीढ़ियों पर विशेष ध्यान दिया जाए। पर्यावरण कानून को संवेदनशील और भविष्योन्मुखी होना चाहिए और इसमें तकनीक, नवाचार, टिकाऊ वित्त और न्यायपूर्ण बदलाव के सिद्धांत को शामिल किया जाना चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए कानून, शासन, विज्ञान, अर्थशास्त्र और सामाजिक समझ के मिले-जुले इस्तेमाल की जरूरत है। उन्होंने जैव विविधता संरक्षण, जलवायु कार्रवाई और विकास के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, जिसे वैज्ञानिक मूल्यांकन, नवाचार और टिकाऊ विकास के सिद्धांतों का समर्थन प्राप्त हो।मेहता ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को मानवीय प्रगति में बाधा के रूप में नहीं, बल्कि स्थायी प्रगति के लिए एक जरूरी शर्त के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए मजबूत संस्थानों, प्रभावी कार्यान्वयन और जिम्मेदार शासन की आवश्यकता है।

सत्र के दौरान, मनोहर लाल ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्मारिका “हरित न्यायम” जारी की और इसकी पहली प्रति राष्ट्रपति मुर्मू को भेंट की। यह प्रकाशन ट्रिब्यूनल की स्थापना, विकास और उपलब्धियों का विवरण देता है और सम्मेलन के दौरान चर्चा किए गए विचारों और दृष्टिकोणों को दर्ज करता है।सम्मेलन के दूसरे दिन “वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियां और सहयोग” पर एक तकनीकी सत्र आयोजित किया गया। इसमें आपस में जुड़ी पर्यावरणीय समस्याओं, साझा प्राकृतिक संसाधनों, एक-दूसरे से टकराते राष्ट्रीय हितों, सीमा-पार सहयोग और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जाने वाले बेहतरीन तरीकों पर चर्चा की गई।एक और सत्र, “भविष्य के लिए वन: वन संरक्षण और बहाली पर बातचीत” में वन प्रशासन, टिकाऊ वन प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी पर चर्चा हुई।

जैव विविधता संरक्षण और जंगलों के लिए उभरते खतरों पर चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने कानूनी और संस्थागत तंत्रों के साथ-साथ वैज्ञानिक, तकनीकी और सैटेलाइट-आधारित निगरानी के इस्तेमाल की भी समीक्षा की।सम्मेलन का समापन इस आह्वान के साथ हुआ कि मजबूत संस्थानों, ज्ञान के आदान-प्रदान और निरंतर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से पर्यावरणीय सिद्धांतों और जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं को प्रभावी कार्रवाई में बदला जाए।https://x.com/rashtrapatibhvn/status/2101658216556114404/photo/2

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