कोच्चि, भारतीय समुद्री मत्स्य क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन वैश्विक स्तर की तुलना में बहुत कम है। यह बात आईसीएआर-केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के एक शोध अध्ययन से सामने आयी है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (एनआईसीआरए) के तहत नेटवर्क अनुसंधान परियोजना के मात्स्यिकी घटक की समीक्षा बैठक में आंकड़े प्रस्तुत करते हुए, सीएमएफआरआई ने पाया कि देश में मछली पकड़ने के चरण में इस क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाले ईंधन का 90 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया गया।
भारत के समुद्री मत्स्य क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन का आकलन करने के लिए एक शोध में, आईसीएआर-सीएमएफआरआई ने अनुमान लगाया कि इस क्षेत्र में एक टन मछली के उत्पादन में 1.32 टन सीओ2 (कार्बन डाइऑक्साइड) का उत्सर्जन होता है, जो उसी मात्रा के लिए दो टन से अधिक के वैश्विक औसत से कम है।
सीएमएफआरआई ने एक बयान में कहा, ‘‘यह क्षेत्र में कुल गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन का आकलन है, मछली पकड़ने के पूर्व चरण से लेकर विपणन तक।’’
आईसीएआर-सीएमएफआरआई के निदेशक ए. गोपालकृष्णन ने कहा कि अध्ययन देश के सभी समुद्री राज्यों के मछली पकड़ने वाले चुनिंदा केंद्रों में किया गया, जिसमें मछली पकड़ने से संबंधित गतिविधियों को तीन चरणों में विभाजित किया गया।’’ गोपालकृष्णन ने कहा, ‘‘समुद्री मशीनीकृत मत्स्य क्षेत्र से देश का कार्बन उत्सर्जन वैश्विक स्तर से 16.3 प्रतिशत कम है।’’
क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
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