विदेश मंत्री जयशंकर ने ‘चिन्मय अमृत महोत्सव’ में संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधार और आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया

संयुक्त राष्ट्र दिवस के अवसर पर आयोजित ‘चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में तत्काल सुधारों, आतंकवाद के खिलाफ मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग, और वैश्विक संघर्षों व आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

अद्वैत या ‘एक वास्तविकता’ के विषय पर बोलते हुए, जयशंकर ने ‘जीरो-सम’ (यानी एक की जीत, दूसरे की हार) वाली सोच से दूर हटने और सहयोग, साझा जिम्मेदारियों तथा वैश्विक एकता पर आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि ‘अविभाज्यता’ का सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र के उन मूल उद्देश्यों में झलकता है, जिन्हें आठ दशक पहले राष्ट्रों के कार्यों को साझा लक्ष्यों की दिशा में एकजुट करने के लिए स्थापित किया गया था।यूक्रेन और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों का जिक्र करते हुए, जयशंकर ने कहा कि कहीं भी होने वाला युद्ध हर जगह शांति के लिए खतरा है; यहाँ तक कि संघर्ष वाले क्षेत्रों से बहुत दूर स्थित देश और आबादी भी इसके आर्थिक और सामाजिक परिणामों को भुगतते हैं।

भारत के इस रुख को दोहराते हुए कि बातचीत और कूटनीति ही एकमात्र समाधान हैं, उन्होंने कहा कि नई दिल्ली शांति के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रही है और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है।आतंकवाद पर, विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि इसे राज्य की नीति के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना अस्वीकार्य है और इसे कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कुछ देश ‘जीरो-टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की नीति अपनाने के बजाय अपने राजनीतिक नफे-नुकसान को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने आतंकवाद के सभी रूपों और प्रकारों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत संकल्प लेने का आह्वान किया।वैश्विक आर्थिक असमानताओं को रेखांकित करते हुए, जयशंकर ने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देश) अभी भी वित्त, ईंधन, भोजन और उर्वरकों के चौतरफा संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने जोर दिया कि इन चुनौतियों से निपटने में ‘ग्लोबल नॉर्थ’ (विकसित देश) की भी बराबर की जिम्मेदारी है।

उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक अस्थिरता, सप्लाई-चेन में रुकावट, बाजार में विकृतियां और रणनीतिक बाधाएं वैश्विक समृद्धि को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने जोखिमों को कम करने के लिए आर्थिक विकल्पों में विविधता लाने और सार्थक अंतरराष्ट्रीय बातचीत की आवश्यकता पर बल दिया।तकनीकी विकास, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बात करते हुए, जयशंकर ने कहा कि इस तकनीक में अभूतपूर्व बदलाव लाने की क्षमता है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि इसके लाभ और विकास को कुछ ही लोगों के हाथों में सीमित नहीं रहने देना चाहिए।

उन्होंने AI गवर्नेंस के लिए एक जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया।विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग में भारत के योगदान पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने COVID-19 महामारी के दौरान अन्य देशों को वैक्सीन की आपूर्ति, 78 देशों में फैली विकास साझेदारियों और सैकड़ों परियोजनाओं, तथा क्षमता-निर्माण की पहलों का उदाहरण दिया।

उन्होंने नेपाल, श्रीलंका, वेनेजुएला और जमैका जैसे देशों में संकट के समय भारत की ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ (सबसे पहले मदद के लिए पहुँचने वाले) की भूमिका का जिक्र किया और इन प्रयासों को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत का व्यावहारिक उदाहरण बताया।बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की वकालत करते हुए, जयशंकर ने कहा कि दुनिया के एक बड़े हिस्से को अब अंतरराष्ट्रीय निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र को अपनी संस्थागत कमियों को दूर करना चाहिए और वैश्विक संकटों के दौरान केवल एक दर्शक बने रहने के बजाय नेतृत्व दिखाना चाहिए।इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रीसनर, स्वामी स्वरूपानंद, स्वामी मित्रानंद और अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।https://x.com/DrSJaishankar/status/2114301276209000857/photo/3

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