शांति के अग्रिम मोर्चे पर तैनात महिलाएं

मेलबर्न, महिलाएं संघर्ष एवं युद्ध की परिस्थतियों में स्त्री-पुरुष के आधार पर कुछ खास और व्यवस्थित मसलों का सामना करती हैं। चुनौती यह होती कि शांति कायम करने की प्रक्रिया में अधिक से अधिक महिलाओं को कैसे सशक्त बनाया जाए। संघर्ष वाले क्षेत्रों में अग्रिम मोर्चे पर युद्धक भूमिकाओं में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं सामने आ रही हैं। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद सालभर से महिलाएं प्रमुख भूमिका निभा रही हैं, लेकिन हमेशा यही स्थिति नहीं रही है।

यूक्रेन में पुरुषों के लिए उपलब्ध सभी सैन्य भूमिकाएं पिछले साल ही महिलाओं को मिलना शुरू हुईं, क्योंकि फरवरी, 2022 में रूस के आक्रमण के बाद नई भर्ती होने लगी। यूक्रेन में लैंगिंक दृष्टि से समावेशी सुधार 2018 में हुए और महिलाओं को भी सशस्त्र बलों में पुरुषों के बराबर का दर्जा हासिल हुआ था और 450 अलग अलग भूमिकाएं निभाने को लेकर महिलाओं पर लगा प्रतिबंध खत्म हो गया। इनमें वेल्डिंग, फायरफाइटिंग और कई अन्य सैन्य भूमिकाएं शामिल थीं।

यह सोवियतकालीन कुछ उन धारणाओं को खत्म करने का प्रयास था कि कुछ कार्य प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। संघर्ष अथवा युद्ध वाले माहौल में महिलाओं और लड़कियों की किसी भी भूमिका में मौजूदगी से उनके लिए पुरुषों के बराबर की खतरा होता है। पंरतु इस सप्ताह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मद्देनजर हमें स्मरण कराया गया कि महिलाओं को कुछ विशेष प्रकार के और व्यवस्थित मसलों का सामना करना होता है जैसे यौन उत्पीड़न, मानव तस्करी और मातृ मृत्यु।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव के लैंगिक मुद्दों संबंधी विशेष सलाहकार का आकलन है कि हाल के संघर्षों के दौरान लड़ाई से इतर होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा महिलााओं की मौतें हुई हैं। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने महिला, शांति और सुरक्षा पर ऐतिहासिक सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1325 पारित किया था जिसमें शांति बहाली की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख था और वैश्विक शांति एवं स्थिरता में महिलाओं की भूमिका के महत्व पर जोर दिया गया था।

इस प्रस्ताव के दो दशक के बाद भी चीजें उम्मीद से कमतर हैं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा जारी है और सांस्कृतिक एवं सामाजिक अवरोध भी जस के तस मौजूद हैं। अफगानिस्तान में पुरुषप्रधान नियम और रवैये ने महिलाओं के सर्वांगीण विकास तथा किसी भी रचनात्मक गतिविधि में उनकी भागीदारी के लिए चुनौती पैदा की है।

विदेश में पढ़ने वाली अफगान छात्रा फातिमा (बदला हुआ नाम) कहती हैं, ‘‘अफगानिस्तान में लोगों का मानना है कि एक महिला का जन्म सिर्फ बच्चा पैदा करने और बच्चे एवं पति की देखभाल करने के लिए हुआ है। उसे कुछ और नहीं करना चाहिए।’’ बांग्लादेश ब्राक विश्वविद्यलय में ‘सेंटर फॉर पीस एंड जस्टिस’ से जुड़े मंजूर हसन और अराफात रजा का कहना है कि वर्ष 2005 से 2020 के दौरान अफगानिस्तान में हुई करीब 80 प्रतिशत शांति वार्ता में महिलाओं की भूमिका नहीं थी तथा 67 में सिर्फ 15 बैठकों में महिलाएं भागीदार रहीं।

क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
फोटो क्रेडिट : Wikimedia commons

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