कोच्चि, केरल उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वे ऐसा प्रभावी तंत्र विकसित करें जिससे हिरासत में लिए गए व्यक्तियों द्वारा अपनी एहतियातन हिरासत के आदेश के खिलाफ दी गई आपत्तियों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित हो सके। मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का आपराधिक मामलों में आरोपी होना उसके संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा उपायों को न तो कम कर सकता है और न ही समाप्त कर सकता है।
पीठ ने कहा ‘‘संविधान द्वारा निर्धारित प्रावधानों का पूरी निष्ठा और सावधानी के साथ पालन किया जाना चाहिए। इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और न ही इन्हें केवल औपचारिकता बनाकर निष्प्रभावी किया जा सकता है।’’ अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए स्वापक औषधि एवं मन: प्रभावी पदार्थ तस्करी रोधी अधिनियम (पीआईटी-एनडीपीएस एक्ट) के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया।
उच्च न्यायालय ने पाया कि संबंधित व्यक्ति द्वारा अपनी एहतियातन हिरासत के खिलाफ दी गई आपत्ति के निस्तारण में चार महीने से अधिक की देरी हुई थी। इसी आधार पर अदालत ने हिरासत के आदेश को निरस्त कर दिया। गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत किसी भी एहतियातन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपनी हिरासत के आदेश के खिलाफ सरकार के समक्ष अभ्यावेदन देने का अधिकार प्राप्त है।
अदालत ने जेल प्रशासन को यह भी निर्देश दिया कि यदि संबंधित व्यक्ति किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। राहत प्रदान करते हुए खंडपीठ ने कहा ‘‘केंद्र और राज्य सरकारों का यह दायित्व है कि वे ऐसा प्रभावी प्रशासनिक तंत्र विकसित और बनाए रखें जिसके तहत पीआईटी-एनडीपीएस अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त होने वाली रिपोर्टों को हिरासत में बंद व्यक्ति द्वारा बाद में दायर किसी भी अभ्यावेदन से तत्काल जोड़ा जा सके ताकि उस पर बिना किसी अनावश्यक देरी के शीघ्र और प्रभावी ढंग से विचार किया जा सके।’
’ अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र या राज्य सरकार की प्रशासनिक समन्वय व्यवस्था में किसी भी प्रकार की कमी या विफलता को यह आधार नहीं बनाया जा सकता कि किसी नागरिक को अवैध या अनावश्यक रूप से हिरासत में रखकर उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जाए।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common