नयी दिल्ली, भारत औद्योगिकीकरण के एक नए दौर में कदम रख रहा है और बढ़ती घरेलू मांग एवं सरकारी समर्थन से अंतरिक्ष सेमीकंडक्टर डेटा सेंटर इलेक्ट्रॉनिक्स सौर विनिर्माण और वैमानिकी जैसे क्षेत्रों में निजी निवेश बढ़ रहा है। ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने अपनी रिपोर्ट में यह निष्कर्ष पेश किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने डेटा सेंटर के लिए कर प्रोत्साहन सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सौर क्षेत्र के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं स्थानीयकरण संबंधी जरूरतों और जीपीयू की खरीद जैसे उपायों के जरिये इस बदलाव को समर्थन दिया है।
जेफरीज ने कहा कि इससे अंतिम उत्पादों के विनिर्माण के साथ घरेलू आपूर्ति श्रृंखला कलपुर्जों बुनियादी ढांचे और इंजीनियरिंग सेवाओं में भी अवसर पैदा हो रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी क्षेत्रों में समान बात यह है कि भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश कर रहा है।
इसके लिए सरकारी प्रोत्साहनों को बड़े घरेलू बाजार बढ़ते डिजिटलीकरण रणनीतिक स्थानीयकरण तथा विनिर्माण और बुनियादी ढांचे की बढ़ती मांग से जोड़ा जा रहा है। अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर निजी क्षेत्र की भागीदारी के अपेक्षाकृत नए क्षेत्र हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर क्षेत्र आयात निर्भरता तथा महज असेंबली से आगे बढ़कर अधिक घरेलू मूल्यवर्धन की ओर बढ़ रहे हैं।
डेटा सेंटर बड़े बुनियादी ढांचा विस्तार के क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं जबकि वैमानिकी भारतीय विनिर्माताओं को वैश्विक उत्पादन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर दे रहा है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण अंतरिक्ष क्षेत्र है। जेफरीज ने कहा कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष क्षमताएं हैं। सरकार ने 2020 में इस क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोला था और 2023 से 2030 के बीच अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को करीब पांच गुना बढ़ाकर 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप शुरुआती स्तर के नवाचार से आगे बढ़कर व्यावसायिक गतिविधियों की ओर बढ़ रहे हैं। स्काईरूट कक्षीय प्रक्षेपण के काम में लगी है जबकि पिक्सल पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह अग्निकुल 3डी-प्रिंटेड रॉकेट इंजन और दिगंतरा उपग्रह-आधारित अंतरिक्ष निगरानी क्षमता के विकास से जुड़ी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत की महत्वाकांक्षा भी नीतिगत योजना से आगे बढ़कर क्रियान्वयन के चरण में पहुंच रही है।
करीब 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा हो चुकी है या उस पर काम चल रहा है। इसमें निर्माणाधीन चिप विनिर्माण संयंत्र और उत्पादन की ओर बढ़ रही कई ओएसएटी (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट) परियोजनाएं शामिल हैं। करीब 13 अरब डॉलर की नई प्रोत्साहन योजना से इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी और मजबूत होने तथा चिप डिजाइन समेत घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ने की उम्मीद है। डेटा सेंटर क्षेत्र में पिछले पांच वर्षों में को-लोकेशन क्षमता पांच गुना होकर करीब दो गीगावाट हो गई है।
क्लाउड सेवाओं को अपनाने डिजिटलीकरण और डेटा स्थानीयकरण की जरूरतों से मांग बढ़ रही है। जेफरीज का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में डेटा सेंटर की क्षमता पांच गुना होकर करीब 10 गीगावाट हो सकती है। इससे डेटा सेंटर संचालकों के लिए करीब नौ अरब डॉलर का राजस्व और बिजली कूलिंग निर्माण तथा नेटवर्क बुनियादी ढांचे में करीब 45 अरब डॉलर के निवेश का अवसर बन सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत अब केवल असेंबली गतिविधियों से आगे बढ़कर घरेलू मूल्यवर्धन और कलपुर्जा उत्पादन पर जोर दे रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जा विनिर्माण योजना (ईसीएमएस) और मोबाइल 2.0 जैसी योजनाओं का उद्देश्य पिछड़ी कड़ी को मजबूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। जेफरीज का अनुमान है कि अगले छह वर्षों में ईसीएमएस मोबाइल कलपुर्जों की सामग्री लागत में करीब 50 प्रतिशत हिस्से को कवर कर सकती है जबकि अभी यह 20 प्रतिशत से कम है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड का अनुमानित बाजार करीब पांच अरब डॉलर है और इसकी मांग का 85-90 प्रतिशत फिलहाल आयात से पूरा होता है।
सौर विनिर्माण में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सौर पीवी विनिर्माता बन गया है। देश में करीब 35 गीगावाट सौर सेल क्षमता चालू है और 100 गीगावाट क्षमता निर्माणाधीन है। रिपोर्ट के मुताबिक मॉडल और विनिर्माताओं की अनुमोदित सूची (एएलएमएम) घरेलू सामग्री संबंधी जरूरतों और पीएलआई योजनाओं से सौर विनिर्माण श्रृंखला में स्थानीयकरण बढ़ रहा है। वर्ष 2030 तक इस मूल्य श्रृंखला का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय होने की उम्मीद है।
वैमानिकी क्षेत्र में भी भारत को वैश्विक आपूर्ति एवं मांग के बीच असंतुलन का फायदा होने का अनुमान है। अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी विनिर्माण लागत और इंजीनियरिंग प्रतिभा के कारण भारत की स्थिति मजबूत है। बोइंग और एयरबस भारत से सालाना 1.4-1.6 अरब डॉलर की खरीद करते हैं। एक्वस आजाद बीएचएफसी डीवाईटीसी मदरसन और सानसेरा जैसी घरेलू कंपनियां वैश्विक मूल उपकरण विनिर्माताओं और पहली श्रेणी के आपूर्तिकर्ताओं को उत्पाद दे रही हैं।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common