अमेरिका की वीजा सख्ती से भारतीय आईटी उद्योग पर पड़ सकता है असरः जीटीआरआई

नयी दिल्ली, अमेरिका में टीसीएस इन्फोसिस और विप्रो समेत आठ प्रौद्योगिकी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रायोजन प्रक्रिया से निलंबित किए जाने से भारतीय आईटी उद्योग प्रभावित हो सकता है। जीटीआरआई ने शुक्रवार को कहा कि यह कदम विदेशी प्रौद्योगिकी पेशेवरों के प्रति अमेरिका के अधिक संरक्षणवादी रुख का संकेत देता है।

आर्थिक शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने एक रिपोर्ट में कहा कि भारत के सॉफ्टवेयर और आईटी-सक्षम सेवाओं के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 54.1 प्रतिशत है। ऐसे में अमेरिकी नीतियों में बदलाव से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों का कारोबार प्रभावित हो सकता है।

जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय कंपनियों को अपने निर्यात बाजारों का विस्तार करने भारत से सेवाएं देने की क्षमता मजबूत करने और जरूरत के हिसाब से स्थानीय स्तर पर नियुक्तियां बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही कृत्रिम मेधा (एआई) और अधिक मूल्यवर्धित प्रौद्योगिकी कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि अमेरिकी नीतियों में बदलाव का असर कम हो।

अमेरिका ने आठ अक्टूबर को टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) इन्फोसिस विप्रो और एचसीएलटेक के अलावा माइक्रोसॉफ्ट एडोबी कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से निलंबित कर दिया। इस कार्यक्रम के तहत नियोक्ता एच-1बी वीजा धारकों समेत विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड यानी स्थायी निवास का प्रायोजन कर सकते हैं। जीटीआरआई के मुताबिक इस कदम से एच-1बी वीजा पर नियुक्तियां अपने आप नहीं रुकतीं और न ही मौजूदा एच-1बी दर्जा रद्द होता है। कंपनियां सामान्य नियमों के तहत एच-1बी कामगारों के लिए आवेदन कर सकती हैं।

श्रीवास्तव ने कहा कि इससे अमेरिकी ग्राहकों की परियोजनाओं पर तत्काल असर सीमित रह सकता है क्योंकि भारतीय आईटी सेवाओं का अधिकतर काम भारत से होता है। हालांकि अमेरिका में काम करने वाले कर्मचारियों को आकर्षित करना और उन्हें बनाए रखना कंपनियों के लिए मुश्किल हो सकता है।

हर साल मंजूर होने वाले एच-1बी आवेदनों में भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सॉफ्टवेयर और आईटी-सक्षम सेवाओं का निर्यात 221.4 अरब डॉलर रहा। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 119.7 अरब डॉलर यानी 54.1 प्रतिशत थी। इस निर्भरता के कारण अमेरिकी नीतियों में बदलाव भारतीय आईटी उद्योग के लिए जोखिम बन सकता है।

हालांकि रिपोर्ट कहती है कि इन पाबंदियों से भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) की वृद्धि को बढ़ावा मिल सकता है। यदि अमेरिका में विदेशी प्रतिभाओं को बनाए रखना मुश्किल होता है तो कंपनियां इंजीनियरिंग के अधिक काम वैश्विक परियोजनाएं और विशेषज्ञ दल भारत स्थित अपने केंद्रों में स्थानांतरित कर सकती हैं।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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