प्रणाली विकास चक्र सिकुड़ रहा, सामग्री विकास चक्र को तालमेल बिठाना होगा: डीआरडीओ प्रमुख

नयी दिल्ली, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख समीर वी. कामत ने कहा कि सामग्री विकास के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके चक्र में 10-15 साल लगते हैं जबकि प्रणाली विकास का चक्र ‘‘लगातार सिकुड़ रहा है’’। उन्होंने यहां सुब्रतो पार्क में आयोजित एक रक्षा संगोष्ठी में कहा कि जब तक सामग्री विकास चक्र प्रणाली विकास चक्र के साथ ‘‘कदम से कदम मिलाकर’’ नहीं चलता तब तक किसी भी नयी सामग्री को जुटाना लगातार‘‘अधिक चुनौतीपूर्ण’’ होता जाएगा।

डीआरडीओ अध्यक्ष ने कहा ‘‘सामग्रियां प्रमुख सक्षम कारक हैं चाहे वे प्रणालियों हथियारों या सेंसर के लिए हों। यदि आप अपनी वर्तमान क्षमताओं से बढ़कर क्षमताएं चाहते हैं तो आपको ऐसी सामग्रियां विकसित करनी होंगी जो वह क्षमता प्रदान कर सकें।’’ उन्होंने भारत को सामग्री विकास की प्रौद्योगिकी के लिए विदेशी देशों पर निर्भर रहने के प्रति आगाह किया।

कामत ने कहा ‘‘आपको यह नहीं मिलेगी। वे आपको यह प्रौद्योगिकी तभी देंगे जब वे इसे अपनी प्रणाली में इस्तेमाल कर चुके होंगे। और जब वे अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकी पर चले जाएंगे तब वे आपको अपनी प्रणाली बनाने के लिए ज़रूरी प्रौद्योगिकी के अलग-अलग हिस्से देंगे।’’ डीआरडीओ प्रमुख ने सामग्री विकास क्षेत्र के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों को रेखांकित करते हुए कहा ‘‘तो अगर आपकी आत्मनिर्भर बनने और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी बनने की कोई महत्वाकांक्षा है तो यह एक ऐसा क्षेत्र है-एकमात्र क्षेत्र नहीं बल्कि एक ऐसा क्षेत्र -जिस पर देश को ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।’’

उन्होंने कहा ‘‘लेकिन आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सामग्री विकास चक्र 10 से 15 साल का होता है। अगर आप देखें तो प्रणाली विकास चक्र लगातार छोटा होता जा रहा है। आज हर पांच साल में नयी प्रणालियां आ जाती हैं और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में हर कुछ साल में या हर साल चीज़ें बदल जाती हैं।’’डीआरडीओ अध्यक्ष ने कहा ‘‘इसलिए जब तक सामग्री विकास चक्र प्रणाली विकास चक्र के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलता तब तक नयी सामग्री को जुटाना अधिक कठिन होता जाएगा।’’

कामत रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव भी हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि अगले पांच से दस वर्षों में सामग्री समुदाय सामग्री चक्र को छोटा करने में सक्षम हो जाएगा। कामत ने कहा ‘‘सामग्री तैयार करने के बाद अगली चुनौती उन्हें उस उत्पाद के रूप में बदलना है जिसकी आपको आवश्यकता है। यहीं पर विनिर्माण की भूमिका आती है।’’ उन्होंने कहा कि आज भारत पोत और पनडुब्बियों जैसे नौसैन्य समाधान के मामले में ‘‘आत्मनिर्भर’’ है। अपने संबोधन में डीआरडीओ प्रमुख ने हितधारकों से सामग्री निर्माण में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण कच्चे माल के क्षेत्र में काम करने का भी आग्रह किया। उन्होंने कहा ‘‘देखिए आज हमारे पास मैग्नेट प्रौद्योगिकी तो है लेकिन हमारे पास दुर्लभ खनिज नहीं हैं। दुनिया के 90 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों पर चीन का नियंत्रण है।

और नियोडिमियम आयरन तथा बोरॉन मैग्नेट में इस्तेमाल होने वाले भारी दुर्लभ खनिजों पर तो चीन का 99 प्रतिशत दबदबा है।’’नयी दिल्ली, कामत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर आगे चलकर अपनी पहचान बनानी है तो इस चीज़ को समग्र रूप से देखने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा ‘‘मुझे पूरा यकीन है कि आत्मनिर्भरता पर सरकार के बढ़ते ज़ोर के साथ इन सभी मुद्दों का समाधान हो जाएगा… और मुझे विश्वास है कि (इस सेमिनार में) आप जो चर्चाएं करेंगे उनसे एक ऐसा रोडमैप तैयार होगा जिसे आप सरकार के सामने पेश कर सकते हैं ताकि इसे आगे बढ़ाया जा सके।’’ इस संगोष्ठी का आयोजन थिंक-टैंक ‘सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज़’ और ‘इंडियन मिलिट्री रिव्यू’ प्रकाशन द्वारा किया जा रहा है।

भारतीय वायुसेना की रखरखाव संबंधी कमान के ‘एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ़’ एयर मार्शल यल्ला उमेश ने उद्घाटन सत्र में अपने संबोधन में कहा कि सैन्य विमानन की परिचालन गति और वातावरण की जटिलता एक ऐसी उच्च-प्रदर्शन वाली प्रणाली की मांग करती है जिसमें असाधारण विश्वसनीयता हो ‘‘ताकि उसे हर हाल में चाहे कुछ भी हो जाए परिचालन स्थिति में बनाए रखा जा सके।’’

पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए एयर वाइस मार्शल ए.के. गंगोपाध्याय ने कहा कि भविष्य के वैमानिकी क्षेत्र में ‘‘सामग्रियां केवल सहायक कारक नहीं हैं बल्कि वे ही कहानी की दिशा तय करती हैं।’’क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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