भारत ने उर्वरक, उद्योग क्षेत्र की गैस आपूर्ति घटाकर शहरी वितरण पर नहीं पड़ने दिया असरः रिपोर्ट

नयी दिल्ली, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति बाधित होने के बीच भारत ने उर्वरक संयंत्रों रिफाइनरी और औद्योगिक उपभोक्ताओं को गैस की आपूर्ति घटाकर शहरी गैस वितरण पर असर नहीं पड़ने दिया है। ऊर्जा परामर्श कंपनी वुड मैकेंजी ने सोमवार को यह बात कही।

इसके साथ ही परामर्श कंपनी ने एक रिपोर्ट में संघर्ष के कारण दक्षिण एशिया में 2026 के दौरान गैस की मांग करीब 60 लाख टन घटने का अनुमान भी जताया। रिपोर्ट के मुताबिक पहले इस साल दक्षिण एशिया में एलएनजी की मांग 27 लाख टन यानी सात प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था। हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान और कतर तथा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आपूर्ति प्रभावित होने के कारण यह अनुमान बदल गया।

रिपोर्ट के अनुसार भारत ने मार्च और अप्रैल में उर्वरक संयंत्रों रिफाइनरी और औद्योगिक उपभोक्ताओं को गैस की आपूर्ति घटाई। इससे घरों में पाइप के जरिये रसोई गैस और वाहनों के लिए सीएनजी की आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिली। सरकारी सब्सिडी ने भी उर्वरक उत्पादन बनाए रखने में मदद की। कंपनी के अनुसार यूरिया का दैनिक उत्पादन 12 000 से 15 000 टन तक बढ़ गया। मई में इसका मासिक उत्पादन 25.19 लाख टन और जून में 25.37 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। हालांकि भारत को महंगी गैस का असर झेलना पड़ा। मार्च से जून के बीच एलएनजी खरीद के लिए निविदाओं में कीमतें 16.8 से 18.8 डॉलर एमएमबीटीयू के बीच रहीं जो सितंबर में बढ़कर 26.4 डॉलर प्रति इकाई हो गईं।

वुड मैकेंजी के मुताबिक ऊंची कीमतों के कारण बांग्लादेश में गैस की मांग 30 लाख टन से अधिक घट गई जबकि भारत और पाकिस्तान में इसमें करीब 15-15 लाख टन की गिरावट देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान और बांग्लादेश खाड़ी देशों से गैस आपूर्ति पर अधिक निर्भर हैं। वर्ष 2025 में पाकिस्तान के एलएनजी आयात में कतर की हिस्सेदारी 99 प्रतिशत और बांग्लादेश के आयात में 70 प्रतिशत से अधिक थी। आपूर्ति बाधित होने से दोनों देशों में गैस की कमी और बिजली कटौती की समस्या बढ़ी।

वुड मैकेंजी में गैस एवं एलएनजी शोध प्रमुख जॉनसन क्वाड्रोस ने कहा इस संकट ने दक्षिण एशिया के गैस बाजारों की कमजोरियों को उजागर किया है। जिन देशों ने आपूर्ति के स्रोतों में विविधता रखी और कीमत तय करने के अलग-अलग विकल्प अपनाए वे संकट से बेहतर तरीके से निपट सके। हालांकि ऊर्जा परामर्शदाता ने कहा कि यदि गैस आपूर्ति में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है तो दक्षिण एशिया में ऊर्जा की ऊंची कीमतों से उपभोक्ताओं उद्योगों और सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ सकता है।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common

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