नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने मणिपुर में जातीय हिंसा के पीड़ितों की राहत और पुनर्वास की देखरेख के लिए उसके द्वारा नियुक्त की गयी न्यायमूर्ति गीता मित्तल समिति का कार्यकाल बुधवार को 31 जुलाई तक बढ़ा दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने समिति का कार्यकाल बढ़ा दिया। पीठ को सूचित किया गया था कि समिति का कार्यकाल पिछले साल जुलाई में समाप्त हो गया था।
उच्चतम न्यायालय को यह भी बताया गया कि समिति ने अब तक पीड़ितों के पुनर्वास से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर शीर्ष अदालत को 42 रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा ‘‘चूंकि जुलाई 2025 के बाद से कोई औपचारिक विस्तार नहीं दिया गया है इसलिए समिति की निरंतरता को नियमित किया जाए और उसे 31 जुलाई 2026 तक का समय दिया जाता है।’’
शीर्ष अदालत ने पीड़ितों की राहत और पुनर्वास तथा उन्हें मुआवजे देने की प्रक्रिया की निगरानी के लिए सात अगस्त 2023 को उच्च न्यायालय की तीन पूर्व महिला न्यायाधीशों की एक समिति गठित करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस प्रमुख दत्तात्रेय पदसालगीकर को आपराधिक मामलों की जांच की निगरानी करने के लिए भी कहा था।
समिति को अपनी रिपोर्ट सीधे उच्चतम न्यायालय को प्रस्तुत करने का कहा गया था जो जातीय संघर्ष से संबंधित मामलों की निगरानी कर रहा है।
जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीत्ता मित्तल की अगुवाई वाली इस समिति में बंबई उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश शालिनी जोशी तथा दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन अन्य सदस्य हैं। राज्य में महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाए जाने के वीडियो को उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘बेहद परेशान करने वाला’ करार दिए जाने के कुछ दिनों बाद इस तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था।
मणिपुर में तीन मई 2023 को जातीय हिंसा भड़कने के बाद से 200 से अधिक लोग मारे गए हैं सैकड़ों घायल हुए हैं और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं।
क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया
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