मॉन्ट्रियल, आज की कृत्रिम मेधा (एआई) प्रौद्योगिकी ऐसा पाठ और विचार तैयार करने में असाधारण रूप से सक्षम हो गई हैं जो काफी हद तक इंसानों की सोच जैसे लगते हैं। चैटजीपीटी क्लॉड गूगल जेमिनी और पर्प्लेक्सिटी एआई जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल पर आधारित चैटबॉट कविताएं लिख सकते हैं नए विचार सुझा सकते हैं और जटिल समस्याओं के समाधान खोज सकते हैं। इनके डेवलपर ने मानव मस्तिष्क से काफी प्रेरणा ली। उन्होंने इंसानी तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) की कार्यप्रणाली पर आधारित कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क तैयार किए। अब ये प्रणालियां ऐसे नतीजे दे रही हैं जो अक्सर इंसानी सोच के नतीजों से मिलते-जुलते हैं।
हालांकि एआई और मानव मस्तिष्क एक ही तरह से काम नहीं करते। नतीजों का एक जैसा होना जरूरी नहीं कि उनके पीछे की प्रक्रियाएं भी एक जैसी हों। ‘विश्व मॉडल’ (वर्ल्ड मॉडल) ऐसी उभरती हुई प्रौद्योगिकी है जो एआई प्रणालियों को इंसानी सोच के करीब लाने में मदद कर सकती है। इसकी मदद से एआई यह सीख सकता है कि आगे क्या हो सकता है और उस अनुमान के आधार पर कैसे कदम उठाया जाए। फिर भी एआई दुनिया को इंसानों की तरह न तो देखेगा न सीखेगा और न ही समझेगा।
कल्पना कीजिए कि आप मेज के किनारे रखे एक कप को उठाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं। अगर आप दूरी का सही अंदाजा नहीं लगा पाए कप को बहुत ढीले ढंग से पकड़ें या तेजी से हाथ बढ़ाएं तो कप नीचे गिरकर टूट सकता है। इंसानों के लिए इस तरह कप उठाना रोजमर्रा का काम है। लेकिन इस साधारण-सी क्रिया के पीछे यह जटिल क्षमता काम करती है कि हम पहले से अनुमान लगा सकें कि आगे क्या हो सकता है। हमारा मस्तिष्क घटनाओं और उनके कारणों को समझकर लगातार उनसे एक कदम आगे रहने की कोशिश करता है। हम पहले ही अंदाजा लगा सकते हैं कि जरूरत से ज्यादा भरे कप को हिलाने पर क्या गड़बड़ी हो सकती है। इसी तरह सोफा खरीदने से पहले ही हम कल्पना कर सकते हैं कि उसे दरवाजे से भीतर ले जाते समय वह फंस सकता है। ऐसे अनुमान दुनिया के साथ हमारी बातचीत और अनुभवों से बनी अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। हम आगे क्या होने की उम्मीद करते हैं उसका असर इस बात पर भी पड़ता है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं और उसके अनुसार कैसे काम करते हैं।
इससे जुड़ा एक प्रभावशाली सिद्धांत ‘पूर्वानुमान आधारित प्रक्रिया’ (प्रडिक्टिव प्रोसेसिंग) कहलाता है। इसके अनुसार हमारी अनुभूति की प्रक्रिया भी कुछ हद तक इसी तरह काम करती है। मस्तिष्क पहले अपेक्षाएं बनाता है फिर उनकी तुलना उसे मिलने वाली जानकारी से करता है और दोनों के बीच अंतर होने पर अपने अनुमान में बदलाव करता है।
आइए फिर कप के उदाहरण पर लौटते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक खाली कप उठाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं लेकिन आपको लगता है कि कप भरा हुआ है। आपका हाथ भारी वस्तु उठाने की तैयारी में जरूरत से ज्यादा जोर लगाता है। कप अचानक ऊपर उठ जाता है और लगभग भारहीन महसूस होता है। आपकी अपेक्षा और वास्तविक अनुभव के बीच यह अंतर आपको संकेत देता है और आप हाथ की गति को ठीक करते हैं और कप के वजन के बारे में अपना अनुमान बदलते हैं।
आज के रोबोट के लिए भी कप को भरोसेमंद ढंग से उठाना आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें लंबे प्रशिक्षण और कृत्रिम परिस्थितियों में बार-बार अभ्यास की जरूरत पड़ सकती है। असली चुनौती यह सीखना है कि भौतिक दुनिया किस तरह काम करती है और किसी कदम का क्या नतीजा हो सकता है। बड़े लैंग्वेज मॉडल पर आधारित चैटबॉट भी अनुमान लगाते हैं लेकिन उनका तरीका अलग होता है। वे अगले शब्द या शब्द के किसी हिस्से का अनुमान लगाना सीखते हैं। अनुमान लगाने का यह तरीका देखने में भले ही सरल लगे लेकिन इससे ऐसी सक्षम प्रणालियां तैयार हो सकती हैं जो जटिल समस्याओं का समाधान कर सकें।
मसलन इस वाक्य पर गौर कीजिए : “एक हाथ मेज के किनारे रखे कप से टकराता है। कप…” विशाल मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों से लैंग्वेज पैटर्न सीखने वाला चैटबॉट इसे आगे बढ़ाते हुए लिख सकता है “किनारे से लुढ़ककर नीचे फर्श पर गिर जाता है।” वह ऐसा आंकड़ों में मौजूद पैटर्न के आधार पर अनुमान लगाकर कर सकता है। इसके लिए उसे कभी वास्तव में कप को छूने या उठाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन संभावित नतीजों का सही वर्णन कर पाने का यह मतलब जरूरी नहीं कि चैटबॉट ने यह भी समझ लिया है कि ऐसा क्यों होता है।
यहीं ‘वर्ल्ड मॉडल’ की भूमिका सामने आती है। यह एआई के ऐसे तरीकों का व्यापक समूह है जिनका उद्देश्य यह अनुमान लगाना है कि परिस्थितियां आगे कैसे बदलेंगी और कुछ मामलों में यह भी कि किस तरह के कदम से उनमें क्या बदलाव आ सकता है। ये मॉडल वीडियो कृत्रिम परिस्थितियों में किए गए अभ्यास या रोबोट के देखने और काम करने की रिकॉर्डिंग से सीख सकते हैं।
घर में काम करने वाले किसी रोबोट के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि वह पहले से समझ सके कि कप को बहुत कसकर पकड़ने से वह टूट सकता है या गलत दिशा में हाथ बढ़ाने से कप गिर सकता है। घटना गति और इंद्रियों से मिलने वाली जानकारी को शामिल करके किए गए शुरुआती शोध बताते हैं कि ये प्रणालियां अपने अनुमानों को भौतिक दुनिया में होने वाली घटनाओं से जोड़ने में मदद कर सकती हैं। हमारे लिए कप सिर्फ मेज पर रखा एक बेलनाकार बर्तन नहीं है। उसे हाथ से पकड़ा जा सकता है वह टूट सकता है वह आपका या मेरा हो सकता है बहुत गर्म हो सकता है या गिरने की कगार पर हो सकता है। कप के बारे में हमारी समझ उसके भौतिक गुणों को उससे जुड़ी संभावित घटना और उनके नतीजों से जोड़ती है।
कप के गिरने का अनुमान लगा लेना इस समझ का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है। इंसानों में यह समझ बहुत कम उम्र में ही विकसित होने लगती है। अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ महीने के शिशुओं को भी वस्तुओं की हलचल को लेकर बुनियादी अपेक्षाएं होती हैं। बाल विकास के शोधकर्ता ज्यां पियाजे का कहना था कि बच्चे दुनिया के साथ क्रिया करके ज्ञान हासिल करते हैं। जैसे-जैसे उनका ज्ञान विकसित होता है वे हर काम को वास्तव में किए बिना ही उसके नतीजों की मानसिक कल्पना करने में सक्षम हो जाते हैं।
इंसानों के लिए सीखने का मतलब सिर्फ कप के बारे में जानकारी जुटाना नहीं है। इसमें कप उठाने के अनुभव उसका वजन महसूस करना उससे पानी छलकते देखना और अंततः बिना कोई प्रयोग किए यह कल्पना कर पाना भी शामिल है कि आगे क्या हो सकता है।क्रेडिट : प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया फोटो क्रेडिट : Wikimedia common