नयी दिल्ली, विशेषज्ञों का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ भूलने की बीमारी हो सकती है लेकिन याददाश्त में लगातार गिरावट एक ही सवाल को बार-बार दोहराना और जाने-पहचाने कामों को करने में कठिनाई होना डिमेंशिया (मनोभ्रंश या स्मृतिक्षय) के संकेत हो सकते हैं और इसे बुढ़ापे का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए स्मृतिक्षय की समय पर पहचान करना बेहद महत्वपूर्ण है ताकि समय रहते जांच कराई जा सके इलाज योग्य स्थिति की पहचान हो सके उचित देखभाल की योजना बनाई जा सके और इस बीमारी से जूझ रहे परिवारों को सहायता दी जा सके।
सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च में जेरियाट्रिक मेडिसिन (वृद्धजन चिकित्सा) के सलाहकार डॉ. हरजीत सिंह भट्टी ने कहा कि जब किसी बुजुर्ग व्यक्ति की याददाश्त व्यवहार या रोजमर्रा के कामकाज में लगातार बदलाव दिखने लगे तो परिवारों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा ‘‘कभी-कभार यह भूल जाना कि आपने अपना चश्मा कहां रखा है या किसी नाम को याद करने में अधिक समय लगना ऐसा उम्र बढ़ने के साथ सामान्य हो सकता है। लेकिन डिमेंशिया इससे अलग है। कुछ ही मिनटों में एक ही सवाल बार-बार पूछना किसी महत्वपूर्ण बातचीत को भूल जाना जाने-पहचाने पड़ोस में रास्ता भटक जाना या घर के रोजमर्रा के कामों को करने में संघर्ष करना इसके चेतावनी भरे संकेत हैं।’’
डॉ. भट्टी ने कहा कि बिना किसी स्पष्ट कारण के वित्तीय गलतियां करना दवाइयों का प्रबंधन करने में कठिनाई होना भाषा की समस्याएं और असामान्य रूप से संदेह चिड़चिड़ापन या उदासीनता दिखाना भी डॉक्टरी जांच की मांग करता है।
आरएमएल अस्पताल में मेडिसिन की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शेली दत्ता ने कहा कि परिवारों को याददाश्त की समस्याओं को किसी एक अकेली घटना से आंकने के बजाय लगातार हो रहे बदलावों के पैटर्न (स्वरूप) को देखना चाहिए।
डॉ. दत्ता ने कहा ‘‘एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि क्या भूलने की बीमारी किसी व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन को प्रबंधित करने की क्षमता में बाधा डालने लगी है। अगर कोई व्यक्ति जो सालों से घर की जिम्मेदारियों को स्वतंत्र रूप से संभाल रहा था अचानक जाने-पहचाने कामों में संघर्ष करने लगे बार-बार अपॉइंटमेंट्स भूलने लगे या सामान्य वित्तीय लेन-देन न संभाल पाए तो परिवार को चिकित्सीय सलाह लेनी चाहिए।’’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक कलंक और सभी संज्ञानात्मक (मानसिक) बदलावों को बुढ़ापे का कारण मानने की प्रवृत्ति के चलते निदान में देरी हो सकती है और देखभाल करना अधिक कठिन हो सकता है।
डॉ. दत्ता ने कहा ‘‘परिवारों को उस व्यक्ति के साथ धैर्य और सम्मान से पेश आना चाहिए बहस से बचना चाहिए और जो बदलाव वे देख रहे हैं उन्हें लिख लेना चाहिए। कोई भी रिश्तेदार जो उस व्यक्ति को अच्छी तरह से जानता हो डॉक्टर से परामर्श के दौरान बहुमूल्य जानकारी दे सकता है। शुरुआती जांच से परिवारों को बीमारी को समझने सुरक्षा पर चर्चा करने और दीर्घकालिक सहायता की योजना बनाने के लिए भी समय मिल जाता है।’’
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के ‘नेशनल सेंटर फॉर एजिंग’ में जेरियाट्रिक मेडिसिन के प्रमुख डॉ. अविनाश चक्रवर्ती ने कहा कि डिमेंशिया के आकलन के लिए एक व्यापक क्लीनिकल मूल्यांकन की आवश्यकता होती है और यह किसी एक स्मृति परीक्षण या किसी एक लक्षण पर आधारित नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा ‘‘आकलन में उस व्यक्ति और परिवार के किसी करीबी सदस्य से विस्तृत इतिहास लेना दवाइयों की समीक्षा न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र की) जांच और संज्ञानात्मक बदलाव दैनिक गतिविधियों को कैसे प्रभावित कर रहे हैं इसका मूल्यांकन शामिल होना चाहिए।’’
डॉ. चक्रवर्ती ने कहा ‘‘अवसाद नींद के विकार दवाइयों के दुष्प्रभाव और कुछ अन्य चिकित्सीय स्थितियां भी याददाश्त और एकाग्रता को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें से कुछ कारणों का इलाज संभव है यही वजह है कि यह मान लेना जरूरी नहीं है कि भूलने की हर घटना डिमेंशिया ही है।’’
उन्होंने बताया कि डिमेंशिया उन स्थितियों के लिए एक व्यापक शब्द है जो संज्ञानात्मक क्षमताओं में इतनी गंभीर गिरावट का कारण बनती हैं कि इससे स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। अल्जाइमर रोग इसका सबसे आम कारण है।
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