प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय फोरम 2026 में भाग लेने वाले ब्रिक्स देशों के सांसदों से बातचीत की और कई मुद्दों पर अपने विचार साझा किए।
‘एक्स’ (X) पर इस बातचीत के बारे में जानकारी देते हुए, मोदी ने बताया कि फोरम के दौरान ब्रिक्स देशों के संसदीय प्रतिनिधियों के साथ उनकी सार्थक चर्चा हुई।
इससे पहले, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद भवन परिसर स्थित ‘संविधान सदन’ में दो दिवसीय फोरम का उद्घाटन किया। उन्होंने ब्रिक्स सदस्य और साझेदार देशों के बीच संसदीय सहयोग को और मजबूत करने का आह्वान किया, ताकि जन-केंद्रित विकास, वैश्विक शांति, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
सभा को संबोधित करते हुए, बिरला ने जोर दिया कि संसदीय जुड़ाव के जरिए देश साझा चुनौतियों का सामना कर सकते हैं, आपसी समझ को गहरा कर सकते हैं और सामूहिक प्रतिबद्धताओं को ठोस नतीजों में बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक विविधता उनकी ताकत बननी चाहिए, जिससे साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सके।
मोदी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों का सम्मेलन) में ‘संयुक्त बयान’ को सर्वसम्मति से अपनाए जाने का जिक्र करते हुए, बिरला ने इस बात पर जोर दिया कि इसमें की गई प्रतिबद्धताओं को व्यावहारिक परिणामों में बदलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि संसदें कानून बनाने, बजट प्रक्रियाओं, विचार-विमर्श और निगरानी के माध्यम से यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं कि तय किए गए लक्ष्यों का लाभ नागरिकों को मिले।
क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, व्यापारिक तनाव, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का जिक्र करते हुए, बिरला ने बातचीत, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संसदीय कूटनीति आपसी विश्वास को मजबूत कर सकती है, तनाव कम कर सकती है और साझा चिंताओं के समाधान के लिए रचनात्मक कदम उठाने में मदद कर सकती है।
बिरला ने ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने में ब्रिक्स की जिम्मेदारी पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस समूह को केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर, ऐसी व्यावहारिक नीतियां और सामूहिक पहल करनी चाहिए जो विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को पूरा करें और वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को मजबूत करें।
‘जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को मजबूत करना’ (Strengthening Parliaments for People-Centric Development) विषय पर आयोजित इस फोरम में चार परस्पर जुड़े क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है: लचीलापन (resilience), नवाचार, सहयोग और स्थिरता। बिरला ने कहा कि संसदीय संस्थानों को मजबूत करने, लोकतांत्रिक जवाबदेही में सुधार लाने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए ये प्राथमिकताएं बहुत महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने संसदों को अधिक पारदर्शी, सहभागी और नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए संस्थागत लचीलापन बढ़ाने, विधायी क्षमताओं में सुधार करने और नवीन तौर-तरीकों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने ब्रिक्स देशों के बीच संसदीय अनुभवों और सर्वोत्तम तौर-तरीकों को साझा करने का भी समर्थन किया, ताकि राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हुए साझा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।
सतत विकास के विषय पर, बिड़ला ने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। उन्होंने ऐसी नीतियों की वकालत की जो विकास को बढ़ावा दें, साथ ही पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखें और आने वाली पीढ़ियों के हितों की रक्षा करें।
लोकसभा अध्यक्ष ने शिक्षा, तकनीक और नवाचार के माध्यम से युवाओं के लिए अवसर पैदा करने के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि संसदों को युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझना चाहिए और राष्ट्रीय विकास में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
ब्रिक्स (BRICS) को ‘समाधानों के एक इकोसिस्टम’ में बदलने के मोदी के विजन का जिक्र करते हुए, बिड़ला ने कहा कि इस मंच की सफलता को इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि यह चर्चाओं को ऐसे ठोस कदमों में कितनी अच्छी तरह बदल पाता है, जिनसे लोगों के जीवन में सुधार आए।
उन्होंने विश्वास जताया कि इन चर्चाओं से ब्रिक्स देशों के बीच साझेदारी गहरी होगी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत होगा और एक अधिक समावेशी, शांतिपूर्ण और टिकाऊ दुनिया बनाने में मदद मिलेगी।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी सभा को संबोधित किया, जबकि लोकसभा के महासचिव ने स्वागत भाषण दिया।https://x.com/narendramodi/status/2114715758072860910/photo/1’